गौरेला-पेंड्रा- मरवाही:-“शासकीय अनुदान के दावे बड़े, जमीनी हकीकत शून्य: मरवाही के जलाशय खाली, बाहरी मछलियों से पटा बाजार”

गौरेला-पेंड्रा- मरवाही:-“शासकीय अनुदान के दावे बड़े, जमीनी हकीकत शून्य: मरवाही के जलाशय खाली, बाहरी मछलियों से पटा बाजार”
गौरेला–पेंड्रा–मरवाही/जीपीएम जिले में छत्तीसगढ़ की नवीन मछली पालन नीति और शासकीय योजनाएं धरातल पर दम तोड़ती नजर आ रही हैं। एक ओर जिला प्रशासन जिले के अस्तित्व के छठवें वर्ष पर “ जोरों से अरपा महोत्सव मना रहे हैं, तो दूसरी ओर मछली पालन विभाग की निष्क्रियता और लापरवाही के कारण स्थानीय किसान और मछुआ समितियां रोजगार व स्वरोजगार के अवसरों से वंचित हो रहे हैं।
स्थिति यह है कि जिले के खुले बाजारों में आज भी सीमावर्ती राज्यों और अन्य जिलों की मछलियां खुलेआम बिक रही हैं, जबकि स्थानीय तालाब और जलाशय खाली पड़े हैं। इससे स्पष्ट है कि विभाग न तो स्थानीय उत्पादन बढ़ा पा रहा है और न ही बाजार व्यवस्था पर कोई नियंत्रण स्थापित कर पा रहा है। परिणामस्वरूप, जीपीएम का जरूरतमंद किसान उत्पादक बनने के बजाय मूकदर्शक खरीदार बनकर रह गया है।
योजनाएं सिर्फ शिविरों और फाइलों तक सीमित..!
मछली पालन विभाग द्वारा समय-समय पर शिविरों और प्रचार-प्रसार के माध्यम से योजनाओं की जानकारी देने का दावा किया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। विभागीय उदासीनता के चलते योजनाएं सरकारी फाइलों और कागजी आंकड़ों तक सिमटकर रह गई हैं।
इसका सीधा असर शासन-प्रशासन की साख पर पड़ रहा है। जिन योजनाओं के माध्यम से किसानों और मछुआ समितियों को लाखों-करोड़ों का अनुदान मिल सकता है, वे हितग्राही जानकारी के अभाव और विभागीय मार्गदर्शन की कमी के कारण लाभ से वंचित हैं।
बैगा जनजाति के लिए नहीं कोई ठोस रोडमैप…!
विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा, जिन्हें राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र के रूप में भी जाना जाता है, उनके आर्थिक उत्थान के लिए मछली पालन एक सशक्त माध्यम बन सकता है। परंतु विभाग के पास इनके लिए कोई स्पष्ट कार्ययोजना या रोडमैप नजर नहीं आता।
यदि विभाग इच्छाशक्ति दिखाए तो बैगा बहुल क्षेत्रों में तालाब आधारित स्वरोजगार मॉडल विकसित कर बड़ी संख्या में रोजगार सृजित किए जा सकते हैं। लेकिन वातानुकूलित कमरों में बैठकर योजनाएं बनाने वाले अधिकारी जमीनी पहल से दूर दिखाई दे रहे हैं।
मरवाही के तालाब और जलाशय योजनाओं से वंचित
मरवाही विकासखंड के इसके साथ अन्य अनेक तालाब और जलाशय अब भी योजनाओं से अछूते हैं। जिला कार्यालय की दूरी और समुचित सूचना के अभाव में कृषकों एवं समितियों तक योजनाओं की जानकारी नहीं पहुंच पा रही है।
जल संसाधन विभाग के नरौर, धरहर और बदरौड़ी जलाशयों सहित अन्य बारहमासी जल उपलब्धता वाले ग्राम पंचायतों के कई तालाब खाली पड़े हैं। यदि इनका वैज्ञानिक ढंग से उपयोग किया जाए तो न केवल स्थानीय बाजार की मांग पूरी हो सकती है बल्कि बाहर से आने वाली मछलियों पर निर्भरता भी खत्म की जा सकती है।
नागरिक सूचना बोर्ड गायब, पारदर्शिता पर सवाल
बारहमासी जलाशयों और तालाबों पर लगाए जाने वाले मछली पालन विभाग के नागरिक सूचना बोर्ड अधिकतर स्थानों पर गायब हैं। इससे न केवल पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लगता है बल्कि इच्छुक किसानों को यह भी जानकारी नहीं मिल पाती कि किस तालाब का पट्टा किस समिति के पास है और कौन-सी योजना लागू है।
सूचना बोर्डों की अनुपस्थिति यह संकेत देती है कि या तो विभाग निगरानी में विफल है या फिर जवाबदेही से बचने की कोशिश हो रही है।
न दौरे, न प्रशिक्षण — किसान असहाय..!
जिले के सहायक संचालक, मछली पालन देवेंद्र कुमार वर्मा एवं अन्य मत्स्य निरीक्षकों द्वारा दूरस्थ क्षेत्रों में नियमित दौरे नहीं किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में न तो व्यापक प्रचार-प्रसार हो रहा है और न ही तकनीकी प्रशिक्षण की व्यवस्था सुदृढ़ है।
मछली पालन एक तकनीकी गतिविधि है, जिसमें बीज चयन, आहार प्रबंधन, रोग नियंत्रण और विपणन की जानकारी आवश्यक है। प्रशिक्षण और मार्गदर्शन के अभाव में किसान जोखिम लेने से बचते हैं और योजनाएं निष्प्रभावी हो जाती हैं।
सवालों के घेरे में विभाग….,दिखावे कागजों में !
# जब जिले में पर्याप्त जल संसाधन उपलब्ध हैं तो स्थानीय उत्पादन क्यों नहीं बढ़ रहा?
# सीमावर्ती राज्यों की मछलियां खुले बाजारों में कैसे बिक रही हैं?
# बैगा समाज और जरूरतमंद किसानों के लिए विशेष कार्ययोजना क्यों नहीं बनाई गई?
खाली पड़े तालाबों का पट्टा आवंटन और उपयोग सुनिश्चित क्यों नहीं किया जा रहा?
अब देखना होगा…
अब देखना यह होगा कि इस गंभीर स्थिति पर जिला प्रशासन और मछली पालन विभाग क्या ठोस कदम उठाते हैं। क्या विभागीय अधिकारी केवल कागजी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटते रहेंगे या जमीनी स्तर पर जाकर योजनाओं का वास्तविक क्रियान्वयन सुनिश्चित करेंगे?
यदि समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं की गई तो नवीन मछली पालन नीति भी अन्य योजनाओं की तरह कागजों में ही दफन होकर रह जाएगी, और जीपीएम का किसान आत्मनिर्भर बनने के बजाय बाजार में बाहरी मछलियों का उपभोक्ता बना रहेगा।





