
मरवाही वनमंडल में ‘कागजी जंगल’ का महाघोटाला! करोड़ों की बंदरबांट, जमीन पर गायब हरियाली – क्या पूरा सिस्टम शामिल?
जीपीएम -मरवाही वनमंडल अब सिर्फ अनियमितताओं का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे सिस्टम में जड़ जमाए भ्रष्टाचार का जीता-जागता उदाहरण बनता जा रहा है। लगातार सामने आ रही शिकायतें, विभागीय सूत्रों की पुष्टि और जमीनी हकीकत इस ओर साफ इशारा कर रही है कि यहां योजनाओं को विकास का माध्यम नहीं, बल्कि “कमाई का जरिया” बना दिया गया।

आरोप बेहद गंभीर हैं—कागजों में जंगल उगाए गए, करोड़ों रुपये निकाल लिए गए, लेकिन जमीन पर सूखा सच खड़ा है।
योजनाओं के नाम पर संगठित खेल! मरवाही वनमंडल में जिन योजनाओं के जरिए पर्यावरण संरक्षण और विकास की बात की गई, उन्हीं योजनाओं को कथित तौर पर घोटाले का माध्यम बना दिया गया—

CAMPA मद लेंटाना उन्मूलन परियोजना
नरवा विकास योजना ग्रीन क्रेडिट योजना सूत्र बताते हैं कि 2018 से 2025 के बीच इन योजनाओं में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हुआ। कार्यों को कागजों में पूरा दिखाकर भुगतान निकाल लिया गया, जबकि जमीनी स्तर पर स्थिति या तो शून्य है या बेहद कमजोर।ग्रीन क्रेडिट योजना: ‘हरियाली’ के नाम पर खुला खेल?

इस योजना में गड़बड़ी के आरोप इतने बड़े हैं कि पूरे मामले की गंभीरता कई गुना बढ़ जाती है— 500 हेक्टेयर में पौधरोपण का दावा वास्तविकता: स्थल कई जगह अनुपयुक्त और पथरीले मनरेगा के पुराने पौधों को नया दिखाकर बिल पास 60 रुपये प्रति पौधा के हिसाब से करीब 3 लाख पौधों की फर्जी एंट्री लगभग 1.80 करोड़ रुपये का भुगतान न सुरक्षा के लिए RCC पोल, न वायर फेंसिंग न सिंचाई की कोई व्यवस्था
70% से अधिक पौधे मौके से गायब यह सवाल खड़ा होता है कि अगर पौधे लगाए गए थे, तो वे गए कहां? और अगर लगाए ही नहीं गए, तो भुगतान कैसे हुआ?नर्सरी से लेकर फील्ड तक – हर स्तर पर ‘सेटिंग’?आरोप यह भी है कि—नर्सरी में पौधे तैयार करने के नाम पर फर्जी खर्च दिखाया गया पौधों की खरीदी और परिवहन में कागजी बिल बनाए गए
फील्ड में काम किए बिना ही पूर्णता प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए यानी बीज से लेकर पेड़ तक हर चरण में भ्रष्टाचार की जड़ें फैली हुई हैं।जमीनी हकीकत: “जहां जंगल दिखाया, वहां बंजर जमीन”
जिन स्थानों पर प्लांटेशन का दावा किया गया—कई जगह पथरीली और अनुपयुक्त भूमि मिली
कई साइट पर पौधरोपण का कोई भौतिक प्रमाण नहीं
स्थानीय लोगों का कहना“यहां कभी कोई रोपण हुआ ही नहीं”यह स्थिति साफ करती है कि कागजों में विकास और जमीन पर धोखा दिया गया।कौन बचा रहा है किसे?
इस पूरे कथित घोटाले में कई स्तरों के अधिकारी-कर्मचारी सवालों के घेरे में हैं—वनमंडल स्तर के वरिष्ठ अधिकारी SDO स्तर के अधिकारी
रेंज स्तर के रेंजर शाखा प्रभारी और कार्यालयीन स्टाफ मुख्य लिपिक शैल गुप्ता CAMPA शाखा प्रभारी भूपेंद्र साहू नर्सरी प्रभारी, डिप्टी रेंजर, फॉरेस्ट गार्ड और मैदानी अमला इतने बड़े स्तर पर गड़बड़ी बिना मिलीभगत के संभव नहीं मानी जा रही।जांच की मांग, लेकिन कार्रवाई शून्य – आखिर क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
लगातार शिकायतों के बावजूद अब तक ठोस जांच क्यों नहीं?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों को राजनीतिक या विभागीय संरक्षण मिल रहा है?क्या यह मामला भी “फाइलों में दबाने” की तैयारी में है?यह चुप्पी खुद कई सवाल खड़े कर रही है।“भ्रष्टाचार का जंगल” – सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी जब सरकार पर्यावरण संरक्षण के नाम पर करोड़ों खर्च कर रही हो और उसी पैसे से कागजों में जंगल उगाए जा रहे हों, तो यह सिर्फ आर्थिक घोटाला नहीं बल्कि पर्यावरण और जनता दोनों के साथ धोखा है।यह मामला अब केवल मरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन गया है।अब क्या होगा?क्या इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच होगी? क्या दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी? या फिर हर बार की तरह यह मामला भी कागजों में दफन हो जाएगा ? मरवाही वनमंडल का यह “कागजी जंगल” अब सिस्टम की सच्चाई उजागर कर रहा है—और जनता जवाब मांग रही है।















