बिलासपुर डीईओ कार्यालय सवालों में ! जिन मामलों को कमिश्नर स्तर तक अमान्य किया गया था, वही बाद में अचानक कैसे हो गए मान्य?

बिलासपुर शिक्षा विभाग में ‘युक्तियुक्तकरण घोटाले’ का विस्फोट!
9 महीने बाद भी बिक रहे संशोधन आदेश? कोर्ट के नाम पर खेल, पुराने आदेश पलटे, डीईओ कार्यालय पर गंभीर आरोप, जेडी की चुप्पी ने खड़े किए बड़े सवाल

बिलासपुर | 04 मई 2026 छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले का शिक्षा विभाग इन दिनों ऐसे विवादों के केंद्र में आ गया है जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला अब केवल विभागीय लापरवाही या तकनीकी त्रुटि तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आरोप सीधे तौर पर “संगठित तरीके से नियमों को दरकिनार कर आदेशों के व्यापार” तक पहुंच चुके हैं।
युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया पूरी हुए लगभग 9 महीने बीत चुके हैं, लेकिन बिलासपुर जिला शिक्षा कार्यालय में अब भी संशोधन आदेशों का खेल जारी है। आरोप यह हैं कि जिन मामलों को पहले तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी अनिल तिवारी और संयुक्त संचालक आर.पी. आदित्य ने अमान्य घोषित कर दिया था, उन्हीं मामलों को दोबारा खोला गया, पुराने आदेशों को पलटा गया और फिर नए आदेश जारी कर प्रकरणों को मान्य कर दिया गया।

सबसे गंभीर बात यह सामने आ रही है कि इन आदेशों में “जिला युक्तियुक्तकरण समिति द्वारा अनुमोदित” जैसी टिप्पणी भी लिखी गई, जबकि चर्चा यह है कि समिति की कोई बैठक ही नहीं हुई। सूत्रों के अनुसार समिति के अध्यक्ष कलेक्टर समेत अन्य सदस्यों को तक इन आदेशों की जानकारी नहीं थी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिरकार शिक्षा विभाग में नियमों के अनुसार काम हो रहा था या फिर कुछ लोगों ने पूरे सिस्टम को निजी नियंत्रण में ले लिया था।
पूरा मामला इसलिए और भी ज्यादा विस्फोटक हो गया है क्योंकि पिछले दो महीनों से कांग्रेस नेता अंकित गौरहा लगातार दस्तावेजों के साथ शिक्षा विभाग में कथित घोटालों की परतें खोल रहे हैं। युक्तियुक्तकरण, अनुकंपा नियुक्ति और पदोन्नति से जुड़े कई दस्तावेज सार्वजनिक किए जा चुके हैं। इतना ही नहीं, केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू तक इस मामले में जांच और कार्रवाई की मांग कर चुके हैं। बताया जा रहा है कि कलेक्टर कार्यालय से भी कई बार संयुक्त संचालक कार्यालय को पत्र भेजे गए, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

अब सबसे बड़ा सवाल संयुक्त संचालक आर.पी. आदित्य की भूमिका को लेकर उठ रहा है। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि शिक्षक संगठनों की हल्की चेतावनी पर तुरंत नोटिस जारी करने वाला तंत्र, अपने ही पुराने आदेशों को पलटने वाले मामलों में आखिर चुप क्यों बैठा है? जिन आदेशों को पहले गलत बताकर निरस्त किया गया था, वही आदेश बाद में अचानक कैसे सही हो गए? और यदि पहले आदेश गलत थे, तो उन अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई जिन्होंने पुराने आदेश जारी किए थे?
यही विरोधाभास अब पूरे मामले को संदिग्ध बना रहा है।
संतोषी शर्मा का मामला इस कथित खेल की सबसे बड़ी मिसाल बनकर सामने आया है। जानकारी के अनुसार 16 फरवरी 2026 को जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से पत्र क्रमांक 1969 जारी कर शिक्षिका संतोषी शर्मा के प्रकरण को मान्य घोषित कर दिया गया। जबकि इससे पहले 1 जुलाई 2025 को तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी अनिल तिवारी इस प्रकरण को अमान्य कर चुके थे और बाद में 5 अगस्त 2025 को संयुक्त संचालक आर.पी. आदित्य ने भी इसे अमान्य माना था।
हैरानी की बात यह है कि दोनों पुराने आदेशों में हाईकोर्ट के आदेश क्रमांक WPS 6464/2025 का उल्लेख किया गया था और उसी आधार पर प्रकरण निरस्त किया गया था। लेकिन बाद में वर्तमान जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे और विधि खंड प्रभारी सुनील यादव ने उसी न्यायालयीन आदेश को आधार बनाकर प्रकरण को मान्य कर दिया।
अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जिस आदेश पर पहले निर्णय दिया जा चुका था, उसी आदेश पर दोबारा नया निर्णय कैसे दिया गया? क्या हाईकोर्ट ने नया निर्देश जारी किया था? क्या जिला समिति की नई बैठक हुई थी? क्या पुराने आदेश निरस्त किए गए थे? यदि ऐसा कुछ नहीं हुआ तो फिर नया आदेश किस अधिकार से जारी किया गया?
वंदना लहरे का मामला भी कम चौंकाने वाला नहीं है। 27 जून 2025 को तत्कालीन डीईओ अनिल तिवारी ने उनके प्रकरण को अमान्य किया था। इसके बाद 8 अगस्त 2025 को संयुक्त संचालक आर.पी. आदित्य ने भी आदेश जारी कर वही निर्णय बरकरार रखा। लेकिन बाद में वर्तमान जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे और विधि खंड प्रभारी सुनील यादव ने हाईकोर्ट के आदेश क्रमांक WPS/5271/2025 का हवाला देते हुए प्रकरण को मान्य कर दिया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हाईकोर्ट का फैसला 19 जून 2025 को ही आ चुका था और उसी फैसले के आधार पर तत्कालीन डीईओ पहले ही निर्णय दे चुके थे। यानी जिस आदेश पर पहले अमान्य घोषित किया गया, उसी आदेश को बाद में मान्य करने का आधार बना दिया गया।
अब विभागीय सूत्र खुलकर यह आरोप लगाने लगे हैं कि न्यायालय के आदेशों का उपयोग केवल “वैधानिक आवरण” देने के लिए किया गया, जबकि असली खेल कहीं और चल रहा था।
जानकी चेलयके का मामला भी इसी पैटर्न पर सामने आया। उनकी याचिका क्रमांक WPS/4595/2025 पर विचार करते हुए 25 जून 2025 को तत्कालीन डीईओ ने प्रकरण अमान्य किया था। इसके बाद 8 अगस्त 2025 को कमिश्नर स्तर की समिति की ओर से संयुक्त संचालक ने भी इसे अमान्य रखा। लेकिन बाद में 10 अक्टूबर 2025 को वर्तमान डीईओ विजय टांडे ने उसी न्यायालयीन आदेश का हवाला देते हुए नया आदेश जारी कर प्रकरण को मान्य कर दिया।
यानी वही याचिका, वही दस्तावेज, वही न्यायालय और वही तथ्य… लेकिन परिणाम पूरी तरह अलग। यही वह बिंदु है जहां से पूरा मामला गंभीर संदेह के घेरे में आ गया है।
सूत्रों का दावा है कि यह केवल तीन मामलों तक सीमित नहीं है। ऐसे दर्जनों प्रकरण बताए जा रहे हैं जिनमें पहले से निरस्त मामलों को दोबारा खोला गया और फिर नए आदेश जारी कर उन्हें मान्य कर दिया गया। शिक्षा विभाग के गलियारों में चर्चा है कि “जिसने सेटिंग कर ली उसका आदेश निकल गया”। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन लगातार सामने आ रहे दस्तावेज विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह जरूर लगा रहे हैं।
पूरे मामले का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू यह भी बताया जा रहा है कि वर्तमान जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे अपने ही कार्यालय के कई कर्मचारियों को छोटे-छोटे मामलों में निलंबित कर चुके हैं। कार्यालय के सहायक ग्रेड-3 हेमंत शर्मा, सहायक ग्रेड-2 विकास तिवारी और सहायक ग्रेड-2 यतींद्र तिवारी जैसे कर्मचारी अलग-अलग मामलों में निलंबन झेल चुके हैं।
लेकिन दूसरी ओर खुद जिला शिक्षा अधिकारी और विधि शाखा पर लगे इतने गंभीर आरोपों के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई नहीं होना पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर रहा है। विभागीय कर्मचारी भी अब यह सवाल उठाने लगे हैं कि क्या नियम केवल छोटे कर्मचारियों के लिए हैं? क्या बड़े अधिकारियों को संरक्षण प्राप्त है? और क्या बिलासपुर शिक्षा विभाग में “दो तरह की व्यवस्था” चल रही है?
अब यह मामला केवल बिलासपुर तक सीमित नहीं रह गया है। लगातार सामने आ रहे दस्तावेज, पुराने आदेशों को पलटने की प्रक्रिया, समिति अनुमोदन पर उठते सवाल और उच्च अधिकारियों की चुप्पी ने पूरे शिक्षा विभाग की साख पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। यदि समय रहते इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो यह मामला आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद बन सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बिलासपुर शिक्षा विभाग में चल क्या रहा था? क्या नियमों के नाम पर आदेशों का कारोबार किया जा रहा था? क्या न्यायालय के आदेशों का गलत उपयोग हुआ? क्या जिला समिति के नाम पर फर्जी अनुमोदन दिखाया गया? और सबसे अहम — क्या इस पूरे खेल को उच्च स्तर का संरक्षण प्राप्त था?
अब निगाहें शासन और शिक्षा विभाग पर टिकी हैं कि वे इस पूरे मामले में निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाते हैं या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।















