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30 लाख के फर्जी मेडिकल बिल घोटाले में शिक्षक नेता पर FIR, अब सवाल—क्या बीईओ और डीईओ कार्यालय के जिम्मेदारों पर भी गिरेगी गाज?

30 लाख के फर्जी मेडिकल बिल घोटाले में शिक्षक नेता पर FIR, अब सवाल—क्या बीईओ और डीईओ कार्यालय के जिम्मेदारों पर भी गिरेगी गाज?

10 महीने तक दबी रही एफआईआर, अब कार्रवाई के बाद पूरे शिक्षा विभाग की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल।

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बिलासपुर। शिक्षा विभाग के चर्चित फर्जी मेडिकल बिल घोटाले में आखिरकार 10 महीने बाद बड़ा एक्शन हुआ है। संकुल समन्वयक एवं शिक्षक नेता साधेलाल पटेल के खिलाफ सिटी कोतवाली पुलिस ने धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र सहित गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कर ली है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस करोड़ों के नहीं तो लाखों के सरकारी फर्जीवाड़े में केवल एक शिक्षक ही जिम्मेदार है, या फिर बिल्हा के तत्कालीन बीईओ, डीईओ कार्यालय और बिल पास कराने वाले कर्मचारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होगी?

संयुक्त संचालक (जेडी) के स्पष्ट निर्देश और विभागीय जांच में फर्जीवाड़े की पुष्टि होने के बावजूद एफआईआर दर्ज होने में करीब 10 महीने लग गए। इस देरी ने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर किसके संरक्षण में फाइल दबाई गई और आरोपी को बचाने की कोशिश किसने की?

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जांच रिपोर्ट के अनुसार साधेलाल पटेल पर स्वयं, अपनी पत्नी तथा मृत शिक्षक के नाम पर मेडिकल प्रतिपूर्ति के फर्जी बिल लगाकर करीब 30 लाख रुपये के सरकारी धन के गबन का आरोप है। आरोप है कि 33 हजार रुपये के वास्तविक मेडिकल बिल को कूटरचना कर 5.33 लाख रुपये दर्शाया गया। कई मामलों में बिलों की राशि बढ़ाकर भुगतान कराने और भुगतान के बाद भी दस्तावेजों में छेड़छाड़ करने के आरोप सामने आए हैं।

शिक्षा विभाग ने पहले ही साधेलाल पटेल को निलंबित कर एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए थे। बिल्हा बीईओ ने 13 अक्टूबर 2025 को सिटी कोतवाली को लिखित शिकायत भी भेजी थी, लेकिन पुलिस कार्रवाई में लंबी देरी ने कई सवाल खड़े कर दिए।

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अब इस मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि फर्जी बिलों की जांच, सत्यापन, स्वीकृति और भुगतान की पूरी प्रक्रिया से गुजरने के बाद भी किसी अधिकारी या कर्मचारी की जवाबदेही क्यों तय नहीं हुई? क्या पुलिस जांच केवल शिक्षक नेता तक सीमित रहेगी या फिर बीईओ कार्यालय, डीईओ कार्यालय और भुगतान प्रक्रिया से जुड़े सभी जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी?

शिक्षा विभाग के इस बहुचर्चित घोटाले में अब सबकी निगाहें पुलिस जांच पर टिकी हैं। यदि जांच निष्पक्ष और व्यापक हुई तो कई और नाम सामने आ सकते हैं, लेकिन यदि कार्रवाई केवल एक आरोपी तक सीमित रही तो पूरे मामले पर सवाल उठना तय माना जा रहा है।

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