अवैध प्लाटिंग पर प्रशासनिक अनदेखी, रजिस्ट्रार कार्यालय पर गंभीर आरोप, प्रतिबंध के बावजूद बेरोकटोक रजिस्ट्री, लाखों की रिश्वत के आरोपों से मचा हड़कंप

अवैध प्लाटिंग पर प्रशासनिक अनदेखी, रजिस्ट्रार कार्यालय पर गंभीर आरोप, प्रतिबंध के बावजूद बेरोकटोक रजिस्ट्री, लाखों की रिश्वत के आरोपों से मचा हड़कंप
बैकुण्ठपुर।बैकुण्ठपुर क्षेत्र में अवैध प्लाटिंग के खिलाफ शासन द्वारा की गई कार्रवाई अब कागजों तक ही सीमित होती नजर आ रही है। मई 2025 में प्रशासन द्वारा जिन भू-खंडों को स्पष्ट रूप से अवैध प्लाटिंग घोषित किया गया था, उन्हीं जमीनों की रजिस्ट्री आज भी धड़ल्ले से की जा रही है। इस पूरे मामले में रजिस्ट्रार कार्यालय बैकुण्ठपुर की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई है।
शासन के आदेशों की खुली अवहेलना
प्रशासनिक आदेशों के अनुसार, अवैध प्लाटिंग घोषित भूमि की न तो खरीद–फरोख्त हो सकती है और न ही उनकी रजिस्ट्री। इसके बावजूद सूत्रों के मुताबिक बैकुण्ठपुर में ऐसे कई मामलों में रजिस्ट्रियां की गई हैं, जिन पर पहले ही प्रतिबंध लगाया जा चुका है। यह स्थिति न केवल शासन के आदेशों की अवहेलना है, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
एसडीओ और रजिस्ट्रार कार्यालय के बयान आपस में टकराए
जब इस संबंध में रजिस्ट्रार कार्यालय बैकुण्ठपुर से सवाल किया गया, तो कार्यालय की ओर से यह कहकर पल्ला झाड़ लिया गया कि अवैध प्लाटिंग से संबंधित कोई भी आधिकारिक सूची या दस्तावेज एसडीओ कार्यालय से प्राप्त नहीं हुए, इसलिए रजिस्ट्री रोकने का कोई वैधानिक आधार नहीं है।
वहीं दूसरी ओर, अनुविभागीय अधिकारी (एसडीओ) कार्यालय का स्पष्ट दावा है कि वर्ष 2025 में ही अवैध प्लाटिंग की सूची, सर्वे विवरण एवं संबंधित दस्तावेज विधिवत रजिस्ट्रार कार्यालय को भेजे जा चुके हैं। इस विरोधाभास ने पूरे मामले को और अधिक संदिग्ध बना दिया है।
जानबूझकर जिम्मेदारी से बचने का आरोप
दोनों विभागों के परस्पर विरोधी बयानों से यह आशंका गहराती जा रही है कि कहीं न कहीं जानबूझकर जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया जा रहा है। सवाल यह है कि यदि दस्तावेज भेजे गए थे, तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि नहीं भेजे गए थे, तो उनका रिकॉर्ड कहां है?
रिश्वतखोरी के गंभीर आरोप
गुप्त सूत्रों के हवाले से सामने आया है कि एक अवैध प्लाट की रजिस्ट्री के लिए लगभग ₹1,00,000 तक की रिश्वत तय की जा रही है। आरोप है कि इसी अवैध लेन-देन के चलते प्रतिबंधित भूमि की रजिस्ट्री खुलेआम की जा रही है। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग का गंभीर मामला बनता है।
आम नागरिकों के लिए भविष्य में बड़ा खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि अवैध प्लाटिंग पर खरीदी गई जमीनें भविष्य में कानूनी विवादों का बड़ा कारण बन सकती हैं। ऐसे भू-खंडों पर न तो वैध निर्माण संभव होगा और न ही मूलभूत सुविधाएं मिलेंगी। इसका खामियाजा अंततः आम नागरिकों को भुगतना पड़ेगा, जबकि दोषी अधिकारी सुरक्षित रह जाएंगे।
राजस्व को भी भारी नुकसान
अवैध कॉलोनियों के फैलाव से शासन को करोड़ों रुपए के राजस्व का नुकसान हो रहा है। नियोजित विकास के बजाय अनियंत्रित और अवैध बसाहट से नगर विकास योजनाएं भी प्रभावित हो रही हैं।
जांच और कार्रवाई की मांग
क्षेत्रवासियों और सामाजिक संगठनों ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। लोगों का कहना है कि केवल छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई कर मामले को दबाया न जाए, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी गहन जांच हो।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि
अवैध घोषित प्लाटों की रजिस्ट्री आखिर किसके संरक्षण में हो रही है?
और क्या दोषियों पर वास्तव में सख्त कार्रवाई होगी या मामला फाइलों में ही दब जाएगा?





