
कलेक्टर की फटकार के बाद भी ढीली कार्रवाई ? निजी स्कूलों की मनमानी पर सिर्फ ‘कागजी सख्ती’!
बिलासपुर। जिले में निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगाने के लिए प्रशासन ने भले ही सख्त आदेश जारी कर दिए हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत अब भी सवालों के घेरे में है। कलेक्टर की कड़ी फटकार के बाद जिला शिक्षा विभाग हरकत में जरूर आया, मगर क्या यह कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगी।

विभाग ने फीस, किताब और यूनिफॉर्म के नाम पर हो रही मनमानी वसूली पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। लेकिन वर्षों से चली आ रही इस अव्यवस्था पर अचानक सख्ती के पीछे विभाग की मंशा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर इतनी शिकायतों के बावजूद अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
हर साल नए सत्र की शुरुआत होते ही अभिभावकों पर तय दुकानों से किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने का दबाव बनाया जाता है। इसके साथ ही अतिरिक्त शुल्क वसूली की शिकायतें आम हैं। हैरानी की बात यह है कि इन शिकायतों के बावजूद शिक्षा विभाग की चुप्पी ने स्कूल प्रबंधन के हौसले बुलंद कर दिए।
अब जारी आदेशों में सख्ती तो दिख रही है, लेकिन निगरानी और जवाबदेही का ठोस तंत्र न होने से इनकी प्रभावशीलता संदिग्ध नजर आ रही है। यदि निरीक्षण केवल औपचारिकता बनकर रह गया, तो स्कूल प्रबंधन फिर वही पुराने हथकंडे अपनाने से पीछे नहीं हटेंगे।
अभिभावकों को फिलहाल किसी बड़ी राहत के संकेत नहीं मिल रहे हैं। न तो पारदर्शी जांच व्यवस्था है, न ही शिकायतों के त्वरित निराकरण की कोई गारंटी। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह सख्ती वास्तव में बदलाव लाएगी या फिर यह भी एक ‘औपचारिक कार्रवाई’ बनकर रह जाएगी?
पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी और उनके अमले की भूमिका भी कठघरे में है। लगातार शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई का अभाव विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कलेक्टर की सख्ती के बाद जारी आदेशों का असर ज़मीन पर दिखेगा या नहीं।
क्या निजी स्कूलों की मनमानी पर सच में लगाम लगेगी, या फिर अभिभावकों का शोषण यूं ही जारी रहेगा?
फिलहाल, आदेश तो जारी हो गए हैं… अब असली परीक्षा उनके क्रियान्वयन की है!
















