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बिलासपुर शिक्षा घोटाला: बच्चों के भविष्य पर खुला व्यापार, सिस्टम सवालों में !

बिलासपुर शिक्षा घोटाला: बच्चों के भविष्य पर खुला व्यापार, सिस्टम सवालों में !

छत्तीसगढ़ बिलासपुर में शिक्षा व्यवस्था को लेकर हालात लगातार चिंताजनक होते जा रहे हैं। जो व्यवस्था कभी सेवा, संस्कार और भविष्य निर्माण का आधार मानी जाती थी, वह अब आरोपों के घेरे में आकर एक संगठित कारोबार का रूप लेती दिखाई दे रही है। शहर में सीबीएसई नाम और संबद्धता की आड़ में कथित रूप से चल रहे निजी स्कूलों के नेटवर्क ने अभिभावकों और आम जनता में गहरी नाराजगी पैदा कर दी है।

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शहर के व्यापार विहार जैसे पॉश इलाकों से लेकर अन्य क्षेत्रों तक फैले इस कथित नेटवर्क को लेकर यह गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं कि एक ही संबद्धता कोड का उपयोग कर अलग-अलग स्थानों पर अवैध शाखाओं का संचालन किया जा रहा है। इस पूरे मामले में ‘बिरला ओपन माइंड इंटरनेशनल स्कूल’ का नाम भी चर्चा में है, जहां मोपका स्थित विद्यालय के सीबीएसई कोड के दुरुपयोग की बात सामने आ रही है। आरोप है कि वैध मान्यता की आड़ में शिक्षा के नाम पर कई संस्थानों का संचालन किया जा रहा है, जो नियमों के सीधे उल्लंघन की श्रेणी में आता है।

सबसे गंभीर सवाल यह उठ रहा है कि आखिर यह सब प्रशासन और शिक्षा विभाग की जानकारी के बिना कैसे संभव है? या फिर यह स्थिति जानबूझकर अनदेखी का परिणाम है? स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लग रहे हैं कि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिक जांच और नोटिस तक ही प्रक्रिया सीमित रह जाती है, जबकि जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी रहती है।

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छत्तीसगढ़ फीस विनियमन अधिनियम 2020 के प्रावधानों के बावजूद कई निजी स्कूलों में फीस संरचना को लेकर पारदर्शिता का अभाव बताया जा रहा है। अभिभावकों का आरोप है कि फीस का कोई स्पष्ट ढांचा सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं किया जाता, जिससे मनमानी वसूली की स्थिति बनती है। यह भी कहा जा रहा है कि फीस से जुड़ी आवश्यक जानकारी स्कूलों की वेबसाइट और सूचना पटलों पर उपलब्ध नहीं है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

इसी तरह एक और गंभीर मुद्दा पुस्तकों की खरीद को लेकर सामने आ रहा है। आरोप है कि राज्य की पाठ्य पुस्तक निगम की सस्ती और मानक पुस्तकों की जगह निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें अनिवार्य रूप से थोपने की स्थिति बनती जा रही है। कुछ अभिभावकों का यह भी कहना है कि विशेष दुकानों के माध्यम से किताबें खरीदने के लिए अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जाता है, जो नियमानुसार पूरी तरह गलत है और प्रतिस्पर्धा व्यवस्था को प्रभावित करता है।

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RTE (शिक्षा का अधिकार अधिनियम) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देशों के पालन को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि शिक्षा के नाम पर चल रहा यह मॉडल अब लाभ आधारित तंत्र में बदलता जा रहा है, जहां बच्चों के अधिकार और अभिभावकों की आर्थिक स्थिति दोनों प्रभावित हो रही हैं।

स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि कुछ ट्रस्टों के नाम पर संचालित संस्थानों के मूल पंजीयन में प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी स्पष्ट वैधानिक स्थिति तक नहीं है, जिससे संचालन की वैधता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहा है। यदि यह तथ्य सत्य पाया जाता है तो यह स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है।

बिलासपुर में यह स्थिति केवल किसी एक संस्था तक सीमित नहीं बताई जा रही है। कई अन्य नामी स्कूलों को लेकर भी पूर्व में शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन उन मामलों में अपेक्षित कठोर कार्रवाई न होने के आरोप भी लगते रहे हैं। यही कारण है कि लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि शिक्षा व्यवस्था पर निगरानी कमजोर होती जा रही है।

सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि क्या प्रशासन इन आरोपों की निष्पक्ष और कठोर जांच करेगा या फिर यह पूरा मामला भी पहले की तरह केवल फाइलों तक ही सीमित रह जाएगा? यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो अभिभावकों का भरोसा पूरी तरह टूटने की आशंका जताई जा रही है, और शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे सवाल और भी गंभीर रूप ले सकते हैं।

न्यायधानी में हालात यह संकेत दे रहे हैं कि अब केवल सुधार की नहीं, बल्कि एक सख्त और व्यापक ‘ऑपरेशन क्लीन एजुकेशन’ की जरूरत है, जिसमें न केवल संस्थानों की जांच हो बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही भी तय की जाए।

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