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मरवाही वनमंडल में ‘पोस्टिंग सिंडिकेट’ का खेल? दागी कर्मचारियों पर मेहरबानी, आदेशों को ठेंगा… अब DFO की भूमिका पर उठे बड़े सवाल”

मरवाही वनमंडल में ‘पोस्टिंग सिंडिकेट’ का खेल? दागी कर्मचारियों पर मेहरबानी, आदेशों को ठेंगा… अब DFO की भूमिका पर उठे बड़े सवाल”

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही।मरवाही वनमंडल इन दिनों गंभीर आरोपों और अंदरखाने चल रहे कथित “संरक्षण तंत्र” को लेकर सुर्खियों में है। वन विभाग के भीतर वर्षों से जमे कर्मचारियों, विवादित पोस्टिंग, लंबित शिकायतों और कार्रवाई के अभाव ने पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप यह है कि विभाग में नियम-कायदों से ज्यादा “संबंध और संरक्षण” काम कर रहे हैं, जिसके चलते दागी और विवादों में घिरे कर्मचारी वर्षों से मलाईदार शाखाओं और संवेदनशील जिम्मेदारियों पर काबिज हैं।

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सूत्रों की मानें तो मरवाही वनमंडल में कई ऐसे कर्मचारी हैं जिनके खिलाफ गबन, वित्तीय अनियमितता, फर्जीवाड़े और पद के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप समय-समय पर उठते रहे, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल फाइलें घूमती रहीं। न जांच पूरी हुई, न स्थानांतरण लागू हुआ और न ही जवाबदेही तय की गई। इससे विभाग की निष्पक्षता और प्रशासनिक नियंत्रण दोनों कटघरे में दिखाई दे रहे हैं।

सबसे ज्यादा चर्चा कैंपा शाखा से जुड़े प्रभारी भूपेंद्र साहू को लेकर हो रही है। बताया जा रहा है कि वे लगभग 10 वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ हैं। शासन के नियमों के अनुसार संवेदनशील शाखाओं में लंबे समय तक पदस्थापना पर रोक और समय-समय पर स्थानांतरण की व्यवस्था होती है, लेकिन यहां कथित तौर पर नियम केवल कागजों तक सीमित दिखाई दे रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि उन्हें हटाने के लिए कई बार आदेश जारी हुए, लेकिन आदेश फाइलों से बाहर नहीं निकल पाए। इससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर किसके संरक्षण में आदेशों की अनदेखी होती रही?

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वनमंडल के भीतर यह चर्चा भी तेज है कि कुछ कर्मचारियों को “ऊपर तक पहुंच” का लाभ मिल रहा है। यही कारण है कि शिकायतों और विवादों के बावजूद वे न केवल पदों पर बने हुए हैं, बल्कि महत्वपूर्ण शाखाओं का प्रभार भी संभाल रहे हैं। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि कुछ कर्मचारियों ने अपने लंबे कार्यकाल के दौरान अघोषित संपत्ति अर्जित की, लेकिन जांच आगे नहीं बढ़ पाई। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह केवल विभागीय लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर प्रशासनिक विफलता मानी जाएगी।

विवादों में जिन नामों की चर्चा सामने आ रही है उनमें राकेश राठौर, उदय तिवारी, प्रभारी साधवानी, शिव शंकर तिवारी (नर्सरी प्रभारी, चिचगोना), महेंद्र तिवारी और राजीव सिसोदिया प्रमुख बताए जा रहे हैं। आरोप है कि अलग-अलग मामलों और शिकायतों के बावजूद इन पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। विभागीय हलकों में यह भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर शिकायतों की जांच किस स्तर पर अटक जाती है और क्यों जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती।

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लगातार सामने आ रहे मामलों के बाद अब मरवाही DFO की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में आ गई है। स्थानीय लोगों, सामाजिक संगठनों और विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई तो वन विभाग की कार्यप्रणाली पर जनता का भरोसा और कमजोर होगा। लोगों का आरोप है कि विभाग में पारदर्शिता की कमी और “चयनात्मक कार्रवाई” का माहौल बन गया है, जहां छोटे कर्मचारियों पर तुरंत कार्रवाई होती है लेकिन प्रभावशाली लोगों पर फाइलें ठंडी पड़ जाती हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ शिकायतें और स्थानांतरण आदेश मौजूद हैं, तो उन्हें लागू क्यों नहीं किया गया? क्या विभागीय अधिकारियों पर किसी प्रकार का दबाव है? या फिर पूरा सिस्टम अंदरखाने समझौते और संरक्षण की संस्कृति में बदल चुका है? इन सवालों के जवाब अब केवल विभागीय बयानबाजी से नहीं, बल्कि ठोस जांच और कार्रवाई से ही मिल पाएंगे।

अब मांग उठ रही है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही वर्षों से एक ही स्थान पर जमे कर्मचारियों की सूची सार्वजनिक कर उनकी पदस्थापना, संपत्ति और कार्यकाल की जांच की जाए। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि वन विभाग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं हुई, तो आने वाले समय में यह मामला बड़े प्रशासनिक घोटाले का रूप ले सकता है।

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