30 लाख के ‘भृत्य घोटाले’ से लेकर युक्तियुक्तकरण में कथित हेरफेर तक… अब बड़े अफसरों पर गिरेगी गाज…..?

30 लाख के ‘भृत्य घोटाले’ से लेकर युक्तियुक्तकरण में कथित हेरफेर तक… अब बड़े अफसरों पर गिरेगी गाज…..?
बिलासपुर।जिले का शिक्षा विभाग इन दिनों भारी विवादों और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण सुर्खियों में है। लंबे समय से दबे स्वर में उठ रहे अनियमितताओं के आरोप अब खुलकर सामने आने लगे हैं। युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया में कथित फर्जी संशोधन, बिना अनुमति पदस्थापनाएं, मौखिक जॉइनिंग, फाइलों से गायब नोटशीट और करोड़ों की प्रशासनिक प्रक्रियाओं में ‘सेटिंग’ के आरोपों ने पूरे विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
मामले ने उस वक्त और तूल पकड़ लिया जब कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने दस्तावेजों के साथ गंभीर शिकायत प्रस्तुत की। शिकायत के बाद कलेक्टर ने सीधे हस्तक्षेप करते हुए संयुक्त संचालक (जेडी) शिक्षा को तीन दिनों के भीतर अंतिम जांच रिपोर्ट सौंपने का सख्त निर्देश जारी कर दिया। कलेक्टर कार्यालय से जारी TL नंबर 19185/25-03-2026 ने साफ संकेत दे दिया है कि अब मामले को दबाना आसान नहीं होगा।

बिना अनुमति जारी हुए संशोधन आदेश…..?
सूत्रों के मुताबिक, शिकायत में आरोप लगाया गया है कि युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप संचालित करने के बजाय मनमाने तरीके से संशोधित किया गया। करीब 200 मामलों में बिना जिला स्तरीय समिति और कलेक्टर की अनुमति के संशोधन आदेश जारी कर दिए गए।
सबसे चौंकाने वाली बात यह बताई जा रही है कि कई फाइलों में न तो सक्षम अधिकारियों के हस्ताक्षर मौजूद हैं और न ही वैध नोटशीट। इससे यह आशंका और मजबूत हो गई है कि पूरी प्रक्रिया को जानबूझकर अपारदर्शी रखा गया ताकि बाद में जिम्मेदारी तय न हो सके।
कुछ मामलों में शिक्षकों को केवल मौखिक आदेश के आधार पर जॉइनिंग कराए जाने की बात भी सामने आई है। प्रशासनिक जानकार इसे बेहद गंभीर मान रहे हैं, क्योंकि सरकारी पदस्थापना प्रक्रिया में लिखित आदेश अनिवार्य होता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर किसके संरक्षण में यह पूरा खेल चलता रहा?
प्रभारी डीईओ और बाबू की भूमिका पर उठे सवाल
मामले में प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे और बाबू सुनील यादव की भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा में है। आरोप है कि प्रभाव, पहुंच और कथित लेन-देन के जरिए कुछ चुनिंदा लोगों को फायदा पहुंचाया गया।
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि नियमों को दरकिनार कर “चहेते” कर्मचारियों और शिक्षकों को लाभ पहुंचाने के लिए पूरी प्रक्रिया को पर्दे के पीछे संचालित किया गया। यही कारण है कि अब जांच की आंच सीधे जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचती दिखाई दे रही है।
रायपुर तक पहुंची जांच की आंच
सूत्रों के अनुसार, रायपुर स्थित डीपीआई में पदस्थ एक अधिकारी पर भी इस पूरे मामले को संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं। यही वजह है कि अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या जांच को प्रभावित कर बड़े जिम्मेदारों को बचाने की कोशिश की जाएगी?
शिक्षा विभाग के भीतर चर्चा है कि यदि निष्पक्ष जांच हुई तो कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं। यही कारण है कि विभागीय गलियारों में इन दिनों जबरदस्त हलचल देखी जा रही है।

30 लाख का ‘भृत्य घोटाला’ बना नई मुसीबत..!
युक्तियुक्तकरण विवाद के बीच कोटा विकासखंड से सामने आया कथित “भृत्य घोटाला” प्रशासन के लिए नई सिरदर्द बन गया है। आरोप है कि एक भृत्य के खाते में “वर्दी धुलाई” सहित अन्य मदों के नाम पर करीब 29 लाख 64 हजार रुपये का भुगतान किया गया।
जानकारी के मुताबिक सितंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच हर महीने 4 लाख रुपये से अधिक की राशि ट्रांसफर की गई। सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया में इतनी बड़ी रकम का लगातार भुगतान होना अपने आप में गंभीर सवाल खड़े करता है।
विभागीय सूत्रों का कहना है कि इतनी बड़ी राशि बिना उच्च स्तर की जानकारी और वित्तीय स्वीकृति के जारी होना संभव नहीं माना जा सकता। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि इस पूरे मामले में कई स्तरों पर मिलीभगत हो सकती है।

छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई, बड़े जिम्मेदार अब भी सुरक्षित…?
फिलहाल मामले में संबंधित क्लर्क और भृत्य को निलंबित कर दिया गया है, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या केवल छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है?
जिला कोषालय के कुछ कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई जा रही है। यदि करोड़ों की सरकारी राशि संदिग्ध तरीके से जारी हुई, तो फिर केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर मामला खत्म करना क्या पूरे सिस्टम को बचाने की कोशिश है?
पहले भी लगे थे गबन के आरोप
यह पहला मामला नहीं है जब शिक्षा विभाग पर वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगे हों। इससे पहले सहायक ग्रेड-2 कर्मचारी राजेश कुमार प्रताप बाली पर भी गबन के आरोप सामने आए थे। हालांकि उस मामले में भी उच्च स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी थी।
यही वजह है कि अब जनता और विभागीय कर्मचारियों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या इस बार भी जांच केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी, या वास्तव में जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई होगी…..?
तीन दिन बाद आएगी ‘सच की रिपोर्ट’
कलेक्टर द्वारा जारी सख्त स्मरण-पत्र ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब जांच में किसी भी प्रकार की लापरवाही या देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो शिक्षा विभाग में बड़े स्तर पर प्रशासनिक कार्रवाई तय मानी जा रही है।
अब पूरे जिले की निगाहें तीन दिन बाद आने वाली जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यह रिपोर्ट न केवल इस कथित घोटाले की परतें खोलेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि शिक्षा विभाग में जवाबदेही वास्तव में कितनी मजबूत है — और क्या बड़े नामों पर भी कार्रवाई होगी या फिर पूरा मामला केवल निचले कर्मचारियों तक सीमित कर दिया जाएगा।















