गौरेला पेंड्रा मरवाही – सहायक आयुक्त आदिवासी विकास के निर्माण कार्यों के नए पैटर्न पर गंभीर सवाल…!

सहायक आयुक्त आदिवासी विकास के निर्माण कार्यों के नए पैटर्न पर गंभीर सवाल…!
टेंडर के बाद बची राशि से लेकर मरम्मत और वाल राइटिंग तक—कोटेशन के जरिए काम कराने या बिना कोटेशन के आरोप, दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के माध्यम से निर्माण कार्य कराए जाने का दावा..!

वाल पेंटिंग कार्य विभागीय सूत्र बताते हैं कि प्रत्येक छात्रावासों में 2 से 5- 6 हजार का वाल पेंटिंग का कार्य किया गया है…!
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले के आदिवासी विकास विभाग में निर्माण एवं मरम्मत कार्यों को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया के बाद बची राशि अथवा शासन से प्राप्त राशि का उपयोग कोटेशन के माध्यम से छोटे-छोटे निर्माण कार्यों में किया जा रहा है और इन कार्यों को विभागीय स्तर पर दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के माध्यम से कराया जा रहा है। पूरे मामले में पारदर्शिता, तकनीकी स्वीकृति, कार्यादेश, मूल्यांकन और भुगतान प्रक्रिया को लेकर जांच की मांग उठ रही है।

पहले चहेते ठेकेदारों पर सवाल, अब बदला पैटर्न?
विभागीय कामकाज को लेकर सामने आए आरोपों के मुताबिक पूर्व में ऐसे कार्य कथित रूप से विभाग से जुड़े पसंदीदा ठेकेदारों के माध्यम से कराए जाते थे, लेकिन अब कार्य कराने का तरीका बदलने का आरोप है। दावा किया जा रहा है कि विभागीय स्तर पर ही लोगों की एक टीम के माध्यम से निर्माण और मरम्मत कार्य कराए जा रहे हैं।

यदि ऐसा हो रहा है तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन कार्यों के लिए विधिवत प्रक्रिया क्या अपनाई गई, किसे कार्यादेश जारी किया गया, सामग्री की खरीदी किसके माध्यम से हुई और भुगतान किसके खाते में किया गया?
सहायक आयुक्त बंगले से लेकर छात्रावासों तक कई कार्यों का दावा आरोपों के अनुसार सहायक आयुक्त के बंगले की बाउंड्रीवाल की ऊंचाई बढ़ाने का कार्य, गौरेला क्रीड़ा परिसर छात्रावास में दरवाजों की फिटिंग एवं अन्य मरम्मत कार्य तथा जिले के विभिन्न आश्रम-छात्रावासों में वाल राइटिंग जैसे कार्य कराए जा रहे हैं।
वहीं मरवाही में छात्रावास की बाउंड्रीवाल से जुड़े कार्यों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। खास बात यह है कि गौरेला क्रीड़ा परिसर में पूर्व में करीब 1 करोड़ 19 लाख रुपये का कार्य हो चुका है। ऐसे में नए मरम्मत अथवा अतिरिक्त कार्यों की आवश्यकता, उनका तकनीकी आकलन और स्वीकृत राशि सार्वजनिक किए जाने की मांग उठ रही है।
दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के माध्यम से निर्माण कार्य कराने का आरोप
पूरे मामले में सपन आइच का नाम भी सामने आ रहा है। आरोप है कि दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के माध्यम से निर्माण कार्यों को संचालित कराया जा रहा है।
यहां सवाल केवल व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी की वैधानिक भूमिका और निर्माण कार्य कराने की उसकी अधिकारिक क्षमता का है। यदि उसके माध्यम से निर्माण कार्य कराए गए हैं तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसे किस आदेश के तहत यह जिम्मेदारी दी गई थी और भुगतान की प्रक्रिया क्या रही। सपन आइच को लेकर पूर्व में मरवाही विकासखंड के निर्माण कार्यों में अनियमितता के आरोपों के चलते हटाए जाने की बात भी कही जा रही है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि और संबंधित आदेश की प्रमाणित प्रति सार्वजनिक होना आवश्यक है।
उपअभियंता की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
मामले की दूसरी कड़ी विभागीय उपअभियंता अंकित जैन को बताया जा रहा है। उनके संबंध में भी मरवाही क्षेत्र में आदिवासी सरपंचों एवं जनप्रतिनिधियों के साथ कथित अभद्र व्यवहार और कमीशनखोरी के आरोपों को लेकर पूर्व में कार्रवाई अथवा हटाए जाने की बात कही जा रही है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। यदि उपअभियंता की भूमिका निर्माण कार्यों के तकनीकी परीक्षण, माप पुस्तिका, मूल्यांकन अथवा भुगतान प्रक्रिया में रही है, तो संबंधित सभी अभिलेखों की जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
ट्राइबल विभाग के तकनीकी अधिकारी की जगह आरोपों से घिरे,आरईएस एसडीओ से मूल्यांकन क्यों?
मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल तकनीकी मूल्यांकन और सत्यापन को लेकर सामने आ रहा है। आरोप है कि शासन द्वारा नियुक्त ट्राइबल विभाग के अनुविभागीय अधिकारी के स्थान पर स्थानीय ग्रामीण यांत्रिकी सेवा यानी आरईएस के एसडीओ को मूल्यांकन/सत्यापन की जिम्मेदारी देने का आदेश जारी किया गया है। यदि यह आदेश जारी हुआ है तो इसकी प्रशासनिक और तकनीकी आवश्यकता क्या थी? क्या संबंधित कार्यों के मूल्यांकन के लिए विभागीय तकनीकी अधिकारी उपलब्ध नहीं थे? आरईएस के एसडीओ को यह जिम्मेदारी किस नियम अथवा आदेश के आधार पर दी गई? इन सवालों का जवाब संबंधित आदेश और विभागीय रिकॉर्ड से ही मिल सकता है।
फाइलों में सबकुछ सही, जमीन पर क्या स्थिति?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या निर्माण कार्य वास्तव में स्वीकृत प्राक्कलन के अनुरूप हुए हैं या केवल फाइलों में प्रक्रिया पूरी की जा रही है।
यदि कोटेशन जारी हुए हैं तो कितने कोटेशन प्राप्त हुए? किस फर्म अथवा व्यक्ति को कार्य दिया गया? कार्यादेश कब जारी हुआ? तकनीकी स्वीकृति किसने दी? माप पुस्तिका किसने तैयार की? सामग्री की खरीदी कहां से हुई? भुगतान किसे किया गया? और कार्य का भौतिक सत्यापन किस अधिकारी ने किया? इन सभी सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि विभागीय प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी अथवा नहीं।
जिला प्रशासन की निगरानी पर भी सवाल
आदिवासी विकास विभाग सीधे तौर पर जिले के आदिवासी आश्रमों, छात्रावासों और विद्यार्थियों से जुड़ा महत्वपूर्ण विभाग है। ऐसे में निर्माण एवं मरम्मत कार्यों में यदि नियमों को दरकिनार कर कार्य कराने या कमीशनखोरी के आरोप सामने आते हैं तो जिला प्रशासन के लिए इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है।
मामले में मांग उठ रही है कि संबंधित सभी कार्यों की स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय जांच कराई जाए। प्रत्येक कार्य की स्वीकृति, प्राक्कलन, कोटेशन, कार्यादेश, माप पुस्तिका, मूल्यांकन, भुगतान वाउचर और संबंधित अधिकारियों के आदेशों की जांच की जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि शासन की राशि का उपयोग नियमानुसार हुआ है या नहीं।
सवाल सीधा है—यदि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी है तो सभी रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के लिए सामने लाने में आपत्ति क्या है? और यदि नियमों के अनुसार ही कार्य हुए हैं तो स्वतंत्र जांच से स्थिति और स्पष्ट क्यों नहीं की जानी चाहिए?
इस मामले में विभाग के सहायक आयुक्त से संपर्क करने पर, कोई जवाब नहीं मिला…!















