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तीन वर्षों से मूल संस्था से दूर व्याख्याता, गुरुकुल छात्रावास में जमे… आखिर किसके संरक्षण में चल रहा खेल…?”

तीन वर्षों से मूल संस्था से दूर व्याख्याता, गुरुकुल छात्रावास में जमे… आखिर किसके संरक्षण में चल रहा खेल…?”

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले के शिक्षा विभाग में पदस्थ एक व्याख्याता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। विकासखंड पेंड्रा अंतर्गत शासकीय हाई स्कूल बचरवार में पदस्थ व्याख्याता संस्कृत जंग बहादुर चौहान पर आरोप है कि वे पिछले लगभग तीन वर्षों से अपनी मूल संस्था में नियमित रूप से उपस्थित नहीं हो रहे हैं, बावजूद इसके लगातार वेतन आहरित किया जा रहा है। इस पूरे मामले ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली, उपस्थिति व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

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जानकारी के अनुसार, जंग बहादुर चौहान की मूल पदस्थापना शासकीय हाई स्कूल बचरवार में है, लेकिन वे लंबे समय से सामान्य छात्रावास गुरुकुल में प्रभारी अधीक्षक के रूप में कार्यरत हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जब संबंधित व्याख्याता संस्कृत अपनी मूल संस्था में अध्ययन कार्य के लिए उपस्थित ही नहीं हो रहे, जबकि इसके अलावा कोई अन्य संस्कृत के व्याख्याता नहीं है,तो वहां विद्यार्थियों की पढ़ाई आखिर कैसे संचालित हो रही है? क्या स्कूल में पढ़ाई भगवान भरोसे चल रही है या फिर विभाग ने इस स्थिति को जानबूझकर नजरअंदाज कर रखा है?

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सूत्र बताते हैं कि इस पूरे मामले की शिकायत पूर्व में तत्कालीन कलेक्टर तक भी पहुंची थी। शिकायत के बाद कथित रूप से निर्देश जारी किए गए थे कि संबंधित संस्था से वास्तविक उपस्थिति प्रमाण पत्र प्राप्त होने के बाद ही वेतन संबंधी प्रक्रिया पूरी की जाए। लेकिन यदि इसके बावजूद संबंधित व्याख्याता को लगातार वेतन जारी होता रहा, यह अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर उपस्थिति प्रमाण पत्र किस आधार पर जारी किए गए? क्या स्कूल प्रशासन ने बिना वास्तविक उपस्थिति के दस्तावेज तैयार किए या फिर पूरा मामला विभागीय मिलीभगत का परिणाम है?

स्थानीय स्तर पर चर्चा यह भी है कि संबंधित व्याख्याता खुले तौर पर यह कहते फिरते हैं कि “सिस्टम में उनकी अच्छी पकड़ है, इसलिए उन पर कोई कार्रवाई नहीं होगी।” यदि यह बात सही है, तो यह न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल है बल्कि शिक्षा विभाग की साख पर भी बड़ा धब्बा माना जा रहा है। आम लोगों का कहना है कि यदि एक शिक्षक खुलेआम व्यवस्था को चुनौती देने लगे और विभाग मौन बना रहे, तो फिर आम कर्मचारियों को नियमों का पालन करने की सीख देना बेमानी हो जाता है।

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मामले का सबसे अहम पहलू यह भी है कि विकासखंड पेंड्रा में पदस्थ एक व्याख्याता को गौरेला क्षेत्र के सामान्य छात्रावास गुरुकुल में प्रभारी अधीक्षक की जिम्मेदारी आखिर किन परिस्थितियों में सौंपी गई? क्या गौरेला क्षेत्र में योग्य कर्मचारियों की कमी थी, या फिर किसी विशेष प्रभाव और पहुंच के कारण यह व्यवस्था बनाई गई? यदि यह अस्थायी व्यवस्था थी, तो फिर तीन वर्षों तक इसे जारी रखने की अनुमति किसने दी?

ग्रामीणों और अभिभावकों में इस पूरे मामले को लेकर भारी नाराजगी देखी जा रही है। उनका कहना है कि सरकारी स्कूलों में पहले ही शिक्षकों/व्याख्यता की भारी कमी बनी हुई है। कई स्कूल एक या दो शिक्षकों के भरोसे संचालित हो रहे हैं। ऐसे में यदि पदस्थ शिक्षक ही वर्षों तक स्कूल से दूर रहेंगे, तो बच्चों की शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा? इसका सीधा असर विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ रहा है।

अभिभावकों का आरोप है कि एक ओर सरकार शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर शिक्षक स्कूलों से गायब हैं और विभाग कार्रवाई करने के बजाय मौन साधे बैठा है। लोगों का कहना है कि यदि किसी छोटे कर्मचारी से मामूली गलती हो जाए तो तत्काल नोटिस और कार्रवाई हो जाती है, लेकिन प्रभावशाली लोगों के मामलों में नियम-कायदे ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं।

  1. वहीं शिक्षा विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। यदि संबंधित व्याख्याता तीन वर्षों से स्कूल नहीं जा रहे थे, तो ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, संकुल स्तर के अधिकारी और स्कूल प्रबंधन आखिर क्या कर रहे थे? क्या किसी ने वास्तविक निरीक्षण किया? यदि किया गया, तो रिपोर्ट में क्या उल्लेख किया गया? और यदि निरीक्षण नहीं हुआ, तो यह भी अपने आप में गंभीर प्रशासनिक लापरवाही मानी जाएगी।

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