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तहसील में ‘चाचा-भतीजे’ का राज! कलेक्टर के आदेशों को ठेंगा, शिक्षा विभाग के लिपिक संभाल रहे न्यायालयीन कामकाज

तहसील में ‘चाचा-भतीजे’ का राज! कलेक्टर के आदेशों को ठेंगा, शिक्षा विभाग के लिपिक संभाल रहे न्यायालयीन कामकाज

संलग्निकरण खत्म होने के दावों के बीच बैकुण्ठपुर और सोनहत तहसील में बाहरी कर्मचारियों की तैनाती पर बवाल, जनदर्शन में पहुंची शिकायत।

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बैकुण्ठपुर।कोरिया जिले की बैकुण्ठपुर तहसील एक बार फिर विवादों के घेरे में है। इस बार आरोप सीधे प्रशासनिक व्यवस्था और कलेक्टर के आदेशों के पालन पर उठ रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि शासन और जिला प्रशासन द्वारा संलग्न कर्मचारियों को मूल पदस्थापना स्थल पर वापस भेजने के स्पष्ट निर्देश जारी होने के बावजूद शिक्षा विभाग के लिपिक आज भी तहसील कार्यालयों में जमे हुए हैं और न्यायालयीन व प्रशासनिक कार्यों का संचालन कर रहे हैं।

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जानकारी के अनुसार 7 अप्रैल 2026 को संलग्न कर्मचारियों को हटाने के आदेश जारी किए गए थे। इसके बाद शिक्षा विभाग ने 30 अप्रैल तक संलग्न शिक्षकों की वापसी का दावा भी किया, लेकिन आरोप है कि लिपिक वर्ग के कर्मचारियों को अब तक नहीं हटाया गया। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि बैकुण्ठपुर और सोनहत तहसील के कई महत्वपूर्ण कार्य इन्हीं कर्मचारियों के भरोसे चल रहे हैं।सबसे गंभीर आरोप यह है कि ये कर्मचारी केवल कार्यालयीन सहयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राजस्व न्यायालय से जुड़े संवेदनशील मामलों—जैसे नामांतरण, बंटवारा, भूमि विवाद और अन्य न्यायालयीन प्रक्रियाओं—में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में गोपनीय दस्तावेजों की सुरक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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मंगलवार को इस पूरे मामले की लिखित शिकायत जनदर्शन में कलेक्टर कोरिया से की गई। शिकायतकर्ताओं ने सवाल उठाया कि यदि संलग्निकरण समाप्त करने के आदेश प्रभावी हैं तो उनका पालन धरातल पर क्यों नहीं दिख रहा? उनका कहना है कि हर बार केवल “कार्रवाई होगी” कहकर मामला टाल दिया जाता है, लेकिन वास्तविक कार्रवाई अब तक नजर नहीं आई। इसी बीच तहसील कार्यालय में कथित “चाचा-भतीजे” की जोड़ी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रभावशाली संबंधों और संरक्षण के चलते कुछ कर्मचारियों को वर्षों से महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों पर बनाए रखा गया है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार सामने आ रही शिकायतों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब आदेश जारी हो चुके हैं तो उनका पालन कौन रोके हुए है? क्या यह केवल व्यवस्था की मजबूरी है या फिर किसी प्रभावशाली संरक्षण का परिणाम? यदि शिकायतों में सच्चाई है तो मामला सिर्फ संलग्निकरण का नहीं, बल्कि सुशासन, जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता की परीक्षा बन चुका है।अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कर सख्त कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

(नोट : समाचार में लगाए गए आरोप शिकायतकर्ताओं के दावों पर आधारित हैं। संबंधित पक्ष का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)

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