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समान नाम का फायदा या आवास योजना में बड़ा खेल? मृत हितग्राही के आवास का लाभ दूसरे व्यक्ति को देने का आरोप

समान नाम का फायदा या आवास योजना में बड़ा खेल? मृत हितग्राही के आवास का लाभ दूसरे व्यक्ति को देने का आरोप

,मृत्यु के बाद आश्रित बहू के नाम पर हुआ स्थल निरीक्षण और जिओ टैग, फिर सरपंच प्रतिनिधि के समान नाम का सहारा लेकर शुरू करा दिया गया आवास निर्माण

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खोंगसरा। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब और जरूरतमंद परिवारों को पक्का मकान उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित आवास योजना में गंभीर अनियमितता का मामला सामने आया है। ग्राम पंचायत क्षेत्र में सामने आए इस मामले में आरोप है कि जिस हितग्राही के नाम से आवास स्वीकृत हुआ था, उसकी मृत्यु के बाद उसके वास्तविक आश्रित परिवार को लाभ देने की प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद आवास का लाभ किसी दूसरे व्यक्ति को दे दिया गया।
मामला सुखदास पिता तिलकदास के नाम से स्वीकृत आवास से जुड़ा बताया जा रहा है। जानकारी के अनुसार सुखदास के नाम से आवास स्वीकृत हुआ था। लेकिन आवास स्वीकृत होने के बाद हितग्राही की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके आश्रित परिवार की बहू इंद्रा पति गरीब दास के निवास स्थल का निरीक्षण किया गया और आवास निर्माण से संबंधित जिओ टैगिंग भी की गई।


ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह माना गया कि हितग्राही की मृत्यु के बाद उसके आश्रित परिवार को नियमानुसार आवास योजना का लाभ दिया जाएगा। लेकिन आरोप है कि इसके बाद पूरे मामले में नया मोड़ आया।
समान नाम का उठाया गया फायदा?
बताया जा रहा है कि ग्राम पंचायत में सरपंच प्रतिनिधि सुखिदास पिता तिलकदास का नाम मूल हितग्राही सुखदास पिता तिलकदास से मिलता-जुलता/समान होने के कारण इसी नाम का फायदा उठाकर आवास का कार्य दूसरे व्यक्ति के लिए शुरू करा दिया गया।
आरोप है कि जिस परिवार के लिए आवास का स्थल निरीक्षण और जिओ टैग किया गया था, उसके स्थान पर दूसरे व्यक्ति के खाते की जानकारी लेकर आवास की राशि ट्रांसफर कर दी गई और आवास निर्माण का कार्य भी शुरू कर दिया गया।
इस पूरे घटनाक्रम ने आवास योजना की कार्यप्रणाली और हितग्राही सत्यापन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जब स्थल निरीक्षण और जिओ टैग हुआ तो फिर लाभार्थी कैसे बदला?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि मृत हितग्राही के आश्रित परिवार की बहू इंद्रा पति गरीब दास के स्थल का निरीक्षण किया गया था और उसी स्थल की जिओ टैगिंग भी की गई थी, तो बाद में आवास का लाभ दूसरे व्यक्ति तक कैसे पहुंच गया?
क्या आवास पोर्टल पर दर्ज जानकारी की जांच नहीं की गई?
क्या बैंक खाते का सत्यापन नहीं हुआ?
क्या हितग्राही और उसके परिवार की पहचान का मिलान नहीं किया गया?
और यदि दोनों व्यक्तियों के पिता का नाम भी तिलकदास ही बताया जा रहा है, तो संबंधित विभागीय कर्मचारियों द्वारा दस्तावेजों और वास्तविक निवास स्थल का सत्यापन किस आधार पर किया गया?
ये सभी सवाल अब जांच के केंद्र में हैं।
आवास मित्र और तकनीकी अमले की भूमिका पर भी सवाल
मामले में आवास मित्र, सरपंच प्रतिनिधि तथा आवास इंजीनियर/तकनीकी सहायक की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि इन लोगों की मिलीभगत से वास्तविक लाभार्थी परिवार को योजना के लाभ से वंचित कर दूसरे व्यक्ति को लाभ पहुंचाया गया।
हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल एक आवास का मामला नहीं, बल्कि सरकारी योजना में हितग्राही चयन, स्थल सत्यापन, जिओ टैगिंग और भुगतान प्रक्रिया की गंभीर अनियमितता का मामला बन सकता है।
दस्तावेजों की जांच से खुल सकता है पूरा मामला
मामले की निष्पक्ष जांच के लिए आवास योजना के रिकॉर्ड की जांच आवश्यक है। इसमें मूल हितग्राही के नाम से जारी स्वीकृति, हितग्राही की मृत्यु के बाद की गई कार्रवाई, आश्रित परिवार से संबंधित दस्तावेज, स्थल निरीक्षण रिपोर्ट, जिओ टैग की जानकारी, आवास पोर्टल पर दर्ज विवरण, बैंक खाते की जानकारी, राशि ट्रांसफर का रिकॉर्ड और वर्तमान निर्माण स्थल का भौतिक सत्यापन महत्वपूर्ण होगा।
यदि इन सभी रिकॉर्ड का मिलान कराया जाता है तो यह स्पष्ट हो सकता है कि आवास किसके नाम स्वीकृत था, किसका स्थल जिओ टैग हुआ, भुगतान किस खाते में किया गया और वास्तविक रूप से आवास का निर्माण किसके लिए कराया जा रहा है।
वास्तविक पात्र परिवार अपने अधिकार से वंचित
इस मामले में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यदि आरोप सही हैं तो जिस परिवार को सरकारी योजना के तहत आवास मिलना था, वही परिवार अपने अधिकार से वंचित हो गया। वहीं समान नाम वाले दूसरे व्यक्ति को योजना का लाभ मिलने की स्थिति ने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रामीणों और संबंधित परिवार की मांग है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए। जांच में यदि किसी कर्मचारी, जनप्रतिनिधि या अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए और वास्तविक पात्र आश्रित परिवार को उसका अधिकार दिलाया जाए।
अब प्रशासन से सवाल—किसके नाम था आवास और किसके खाते में पहुंची राशि?
मामले में प्रशासन के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि सुखदास पिता तिलकदास के नाम स्वीकृत आवास की प्रक्रिया मृत्यु के बाद किस आधार पर आगे बढ़ाई गई, इंद्रा पति गरीब दास के स्थल का जिओ टैग क्यों किया गया और बाद में समान नाम वाले दूसरे व्यक्ति को आवास का लाभ कैसे मिल गया?।

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इन सवालों का जवाब जांच और सरकारी रिकॉर्ड से ही सामने आएगा। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और वास्तविकता सामने लाने के लिए क्या कार्रवाई करता है।

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