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“छात्रावास अधीक्षक नियुक्ति में बड़ा घोटाला – नियम विरुद्ध आदेश से हड़कंप, शासन की चुप्पी पर सवाल”

छात्रावास अधीक्षक नियुक्ति में बड़ा घोटाला – नियम विरुद्ध आदेश से हड़कंप, शासन की चुप्पी पर सवाल”

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही:- जिले के छात्रावासों में अधीक्षक पद पर नियुक्ति को लेकर बड़ा घोटाला सामने आया है। आरोप है कि आदिवासी विभाग के सहायक आयुक्त ने शिक्षा विभाग से आवश्यक  (एनओसी) लिए बिना ही मनमाने ढंग से शिक्षकों की नियुक्ति कर दी गई है। यह न केवल शासन के आदेशों का उल्लंघन है, बल्कि भ्रष्टाचार और लेन-देन की गंध भी इसमें साफ दिखाई दे रही है…?

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नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं

शासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों में स्पष्ट उल्लेख है कि छात्रावास अधीक्षक पद पर वही शिक्षक नियुक्त किए जा सकते हैं जिनकी कार्यस्थली 5 किलोमीटर की परिधि में आता हो या उस छात्रावास के निकट स्थित हो, ताकि शिक्षक छात्रावास के बच्चों की देखरेख नियमित रूप से कर सकें। लेकिन, जिले में इस नियम को दरकिनार कर दिया गया है। दूरस्थ विद्यालयों में पदस्थ शिक्षकों को भी अधीक्षक बनाया जा रहा है, जिससे बच्चों की सुरक्षा और व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। कहा का नियम कहता है की प्रधान पाठक को हॉस्टल अधीक्षक बनाए जाए..??

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लेन-देन की चर्चा तेज…?

स्थानीय सूत्रों का दावा है कि इस पूरी प्रक्रिया में पैसों का लेन-देन और गुप्त सौदेबाजी हो रही है। जिन शिक्षकों के खिलाफ पहले शिकायतें दर्ज थीं और जिन्हें अधीक्षक पद से हटाया जा चुका था, उन्हीं को फिर से पदस्थ करने की कोशिशें की जा रही हैं। इससे यह संदेह और गहरा हो जाता है कि नियुक्तियां योग्यता और नियमों के आधार पर नहीं, बल्कि पैसों के बल पर हो रही हैं..?

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छात्र हित प्रभावित

छात्रावासों में पहले से ही बच्चों को सुरक्षा, भोजन और अनुशासन की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। अब यदि नियमों को ताक पर रखकर मनमाने ढंग से अधीक्षक नियुक्त किए जाएंगे, तो बच्चों के भविष्य और पढ़ाई पर सीधा असर पड़ेगा।

शिक्षक संघ और अभिभावकों का आक्रोश

जिले के शिक्षक संगठनों और अभिभावक संघों ने इस पूरे मामले को शासन के आदेशों का खुला उल्लंघन बताया है।
एक शिक्षक प्रतिनिधि ने कहा –
“शासन ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं, लेकिन अधिकारी अपने स्वार्थ और लाभ के लिए नियमों की अनदेखी कर रहे हैं। यदि इस पर रोक नहीं लगी तो हम आंदोलन करने को मजबूर होंगे।”

इसी तरह अभिभावक संघ के एक पदाधिकारी ने कहा –

“हमारे बच्चे छात्रावासों में सुरक्षित नहीं हैं। यदि नियुक्तियां पैसों और सौदेबाजी के आधार पर होंगी तो बच्चों का भविष्य अंधकारमय होगा..?”

प्रशासन की भूमिका संदिग्ध

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि जिला प्रशासन गंभीरता से जांच करे तो इस तरह की मनमानी संभव ही नहीं। लेकिन अब तक प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई न होने से लोगों में यह चर्चा है कि कहीं प्रशासनिक मौन भी संलिप्तता का संकेत तो नहीं है…?

राजनीतिक गलियारों में भी गूंज

यह मामला अब राजनीतिक गलियारों तक भी पहुंचने लगा है। विपक्षी दलों के स्थानीय नेताओं ने इसे “भ्रष्टाचार का तंत्र” बताते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

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