
बैगा बाहुल्य बच्चों के भविष्य से खिलवाड़! 4वीं-5वीं के छात्र नहीं पढ़ पा रहे हिंदी, शौचालय-किचन शेड तक नसीब नहीं… आखिर जिम्मेदार कौन?
गौरेला। शासन बैगा बाहुल्य समुदाय के बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने, गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई और बेहतर मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे करती है। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए हर वर्ष लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन गौरेला विकासखंड के दूरस्थ बैगा बहुल ग्राम साल्हेघोरी और छिरहिट्टी के शासकीय प्राथमिक विद्यालयों की जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है।


इन विद्यालयों की स्थिति देखकर यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर बैगा बच्चों के विकास के नाम पर चल रही योजनाओं का लाभ उन्हें कब मिलेगा? शिक्षा, स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े गंभीर सवाल अब पूरे शिक्षा विभाग के सामने खड़े हैं।
4वीं-5वीं के बच्चे हिंदी तक नहीं पढ़ पा रहे…!

सबसे गंभीर मामला शासकीय प्राथमिक शाला साल्हेघोरी का है, जहां 4वीं और 5वीं कक्षा के कई बच्चे हिंदी तक ठीक से नहीं पढ़ पा रहे हैं। प्राथमिक स्तर पर भाषा की बुनियादी समझ ही आगे की शिक्षा की नींव होती है। यदि बच्चे इस स्तर पर भी पढ़ने में सक्षम नहीं हैं, तो शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
इस संबंध में विकासखंड शिक्षा अधिकारी का कहना है कि यदि 4वीं और 5वीं के बच्चे हिंदी नहीं पढ़ पा रहे हैं तो संबंधित शिक्षकों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या पूरी जिम्मेदारी केवल शिक्षकों की है? वर्षों से शैक्षणिक गुणवत्ता की समीक्षा करने वाले अधिकारी, संकुल स्तर की निगरानी व्यवस्था और विभागीय निरीक्षण की जवाबदेही कौन तय करेगा?
शौचालय का अभाव, खुले में शौच को मजबूर मासूम
विद्यालय में शौचालय की समुचित व्यवस्था नहीं होने से छोटे-छोटे बच्चों को खुले में शौच जाना पड़ता है। बरसात के मौसम में चारों ओर जंगल, झाड़ियां और कीचड़ के बीच बच्चों को जाना पड़ता है, जहां हर समय सांप-बिच्छू और जहरीले जीवों का खतरा बना रहता है।
एक ओर सरकार “स्वच्छ विद्यालय” की बात करती है, वहीं दूसरी ओर बैगा अंचल के बच्चे आज भी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहे हैं।
किचन शेड नहीं, टपकती छप्पर के नीचे बनता है मध्यान्ह भोजन…!

विद्यालय के प्रधान पाठक ने बताया कि स्कूल में आज तक स्थायी किचन शेड का निर्माण नहीं हुआ। वर्तमान में लकड़ी और छप्पर से बने अस्थायी ढांचे में मध्यान्ह भोजन तैयार किया जाता है। बारिश के दौरान छत से पानी टपकता है, जिससे भोजन बनाना मुश्किल हो जाता है।
ऐसे में मध्यान्ह भोजन योजना की गुणवत्ता और बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

स्कूल तक पहुंचना भी किसी चुनौती से कम नहीं
प्राथमिक शाला छिरहिट्टी सड़क से लगभग 20 मीटर दूर स्थित है। स्कूल तक पहुंचने के लिए बच्चों को ऊबड़-खाबड़ रास्ते और बड़े-बड़े गड्ढों से होकर गुजरना पड़ता है। बरसात में यह रास्ता दलदल में बदल जाता है। ऐसे हालात में छोटे-छोटे बच्चे रोज जोखिम उठाकर स्कूल पहुंचते हैं।
क्या योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?

बैगा समुदाय के विकास और शिक्षा के लिए हर साल लाखों रुपये खर्च किए जाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन यदि आज भी बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शौचालय, किचन शेड और सुरक्षित रास्ते जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इन योजनाओं का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है?
क्या दूरस्थ बैगा अंचलों तक सरकारी योजनाएं पहुंच ही नहीं रही हैं, या फिर कागजों में विकास दिखाकर जमीनी हकीकत को नजरअंदाज किया जा रहा है?
यदि 4वीं और 5वीं के बच्चे हिंदी नहीं पढ़ पा रहे हैं तो इसकी निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच आवश्यक है। केवल शिक्षकों पर कार्रवाई की चेतावनी देना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी जांच होनी चाहिए कि वर्षों से निरीक्षण करने वाले अधिकारी, शिक्षा गुणवत्ता की समीक्षा करने वाली व्यवस्था और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने वाले विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाने में क्यों असफल रहे।


















