
उपका में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया छत्तीसगढ़ का पारंपरिक भोजली विसर्जन पर्व
जीशान अंसारी की रिपोर्ट,उपका: शासकीय प्राथमिक शाला उपका एवं शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला उपका में संयुक्त रूप से छत्तीसगढ़ के लुप्त होते पारंपरिक लोक पर्व भोजली विसर्जन को अत्यंत हर्षोल्लास और सामुदायिक सहभागिता के साथ मनाया गया।


परंपरा के अनुसार भोजली पर्व की शुरुआत श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि अर्थात नाग पंचमी के दिन से होती है। इस दिन महिलाएं एवं बालिकाएं बांस की छोटी टोकरी टुकनी में कुम्हार के घर की खाद-मिट्टी लाकर उसमें गेहूं, धान, जौ, उड़द और मक्का के बीज बोती हैं। इसे घर के अंधेरे और पवित्र स्थान पर रखा जाता है, रोज हल्दी-पानी का छिड़काव कर पूजा-अर्चना और भोजली सेवा गीत गाए जाते हैं।


लगभग 7 से 9 दिनों तक देखभाल के बाद ये बीज 4 से 6 इंच के हरे-पीले पौधों के रूप में विकसित होते हैं। मान्यता है कि जितनी अच्छी और बड़ी भोजली उगेगी, आने वाले वर्ष में फसल भी उतनी ही अच्छी होगी।

इसका विसर्जन हर वर्ष *रक्षाबंधन के दूसरे दिन, भाद्र मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि को* किया जाता है।
विद्यालय में बच्चों ने नाग पंचमी के दिन ही पारंपरिक लोकगीत गाते हुए बीज बोकर इस पर्व का शुभारंभ किया था। रक्षाबंधन के दूसरे दिन बच्चों ने टोकरियों को सिर पर रखकर पूरे गांव में “देवी गंगा, देवी गंगा लहर तुरंगा” जैसे भोजली गीत गाते हुए शोभायात्रा निकाली और तालाब में विधि-विधान से भोजली का विसर्जन किया।विसर्जन के बाद बच्चों और ग्रामीणों ने एक-दूसरे के कान में भोजली खोंस कर “भोजली-भोजली, गंगा जल” कहकर अटूट मित्रता और भाईचारे का बंधन निभाने का संकल्प लिया तथा सुख-समृद्धि की कामना की।
इस अवसर पर ग्राम के सभी गणमान्य नागरिक, महिला समूह, दोनों विद्यालयों के प्रधान पाठक एवं समस्त शिक्षक उपस्थित रहे।















