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गौरेला-पेंड्रा-मरवाही का ‘खाकी न्याय’ : जहाँ घोटालेबाज़ बेदाग और पत्रकार ही बन गए ‘अपराधी’!

विशेष व्यंग्य रिपोर्ट : गौरेला–पेंड्रा–मरवाही (छत्तीसगढ़) गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले में इन दिनों कानून व्यवस्था का ऐसा “नायाब मॉडल” देखने को मिल रहा है, जिसे देखकर संविधान भी शर्म से पन्ने पलट ले। मामला है ग्राम पंचायत कुडकई का, जहाँ पंचायत सचिव पर लाखों रुपये के घोटाले के आरोप हैं, लेकिन कार्रवाई घोटालेबाज़ पर नहीं – बल्कि उसकी पोल खोलने वाले पत्रकारों पर हो गई!

अब छत्तीसगढ़ में शायद नया नियम लागू हो गया है —:

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“घोटाला करो तो सम्मान पाओ, और उजागर करो तो FIR खाओ।”

ग्राम पंचायत कुड़कई में सचिव द्वारा विकास कार्यों के नाम पर लाखों की बंदरबांट की गई। परेशान ग्रामीणों ने आखिरकार लिखित शिकायत दी। मामला बढ़ा तो पत्रकारों ने सच सामने लाने की हिमाकत कर दी। खबरें छपीं, सवाल उठे और प्रशासन को मजबूरन जांच समिति बनानी पड़ी। यहाँ तक तो सब ठीक था… लेकिन इसके बाद जो हुआ, वो लोकतंत्र के लिए किसी व्यंग्य से कम नहीं।  जांच से पहले ही सचिव महोदय ने पलटवार कर दिया। जिन पत्रकारों ने खबर छापी, उन्हीं पर “अवैध वसूली” जैसे संगीन आरोप जड़ दिए। और हैरानी की बात यह कि बिना किसी ठोस जांच, बिना तथ्यों की पुष्टि के – सीधे FIR दर्ज! वो भी गैर-जमानती धाराओं में। अब लोग पूछ रहे हैं — क्या अब छत्तीसगढ़ में खबर लिखना भी अपराध हो गया है?   पेंड्रा थाना प्रभारी रणछोड़ दास सेंगर जी ने इस पूरे मामले में ऐसी “फुर्ती” दिखाई, मानो पत्रकार ही जिले के सबसे बड़े अपराधी हों। घोटाले के आरोपी सचिव पर कोई कार्रवाई नहीं, लेकिन पत्रकारों पर रातों-रात केस! इसे कहते हैं 

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“खाकी न्याय: जहाँ आरोपी को VIP ट्रीटमेंट और सच बोलने वाले को हथकड़ी।”

इसी बीच इलाके के लोग एक और कड़वा सवाल उठा रहे हैं। थाना क्षेत्र में खुलेआम गांजा बिक रहा है, जगह-जगह शराब बैठाकर लोगों को परोसी जा रही है, रात होते ही नशे का यह कारोबार बेखौफ चलता है। लेकिन यह सब थाना प्रभारी की नजरों से जैसे अदृश्य है। इन अवैध धंधों पर कार्रवाई कहीं दिखाई नहीं देती। हाँ, जब बात पत्रकारों पर मामला दर्ज करने की आती है, तो बिना किसी जांच-पड़ताल, बिना तथ्यों की तस्दीक के, FIR दर्ज करने में ऐसी महारत दिखाई जाती है मानो यही सबसे बड़ी कानून व्यवस्था की चुनौती हो।    एक थाना प्रभारी की तानाशाही इस कदर है कि न घोटाले की जांच पूरी होने का इंतजार, न आरोपों की सत्यता की पड़ताल  बस आवेदन मिला और FIR ठोक दी! अब सवाल यह है कि क्या पुलिस अब न्याय नहीं, बल्कि दबाव और डर का हथियार बन चुकी है?लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाला पत्रकार आज खुद इंसाफ की भीख मांग रहा है। घोटाले की खबर छापने का इनाम — अपराधी की तरह मुकदमा! अगर यही सिस्टम रहा तो आने वाले दिनों में शायद नया स्लोगन चले 

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“भ्रष्टाचार करो, पुलिस बचाएगी;  सच लिखो, पुलिस सताएगी!”

जांच समिति बनी जरूर है, लेकिन जनता पूछ रही है कि जब तक घोटालेबाज़ पर कार्रवाई नहीं होती और जब तक पत्रकारों पर दर्ज कथित झूठे केस वापस नहीं लिए जाते, तब तक यह समिति सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाने वाली सजावट ही बनी रहेगी।     इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि गौरेला–पेंड्रा–मरवाही में अब न्याय की परिभाषा बदल चुकी है। यहाँ घोटालेबाज़ सुरक्षित हैं और सच बोलने वाले सलाखों के साए में।

अब कोर्ट जाने की ज़रूरत नहीं। बस किसी ‘खास’ अधिकारी से सेटिंग कर लीजिए — पीड़ित खुद-ब-खुद आरोपी बन जाएगा।

जय हो इस ‘अद्भुत’ कानून व्यवस्था की, जहाँ वर्दी की ओट में घोटाले फलते-फूलते हैं और सच बोलने वालों की आवाज कुचली जाती है!

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