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एक पेड़ मां के नाम” वृक्षारोपण अभियान में 2000 पौधे रोपे, मां के नाम समर्पित कर भावनात्मक जुड़ाव से पर्यावरण संरक्षण का संदेश

“एक पेड़ मां के नाम” वृक्षारोपण अभियान में 2000 पौधे रोपे, मां के नाम समर्पित कर भावनात्मक जुड़ाव से पर्यावरण संरक्षण का संदेश

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, 17 जुलाई 2025।जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) पेंड्रा के तत्वावधान में संचालित राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) इकाई द्वारा आज स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, कोटमीकला में “एक पेड़ मां के नाम” वृहद वृक्षारोपण अभियान सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस अवसर पर छात्रों, स्टाफ और ग्रामवासियों की उपस्थिति में पर्यावरण संरक्षण का भावनात्मक संदेश भी दिया गया।

अभियान के लिए वनमंडलाधिकारी, पेंड्रारोड के सौजन्य से 1000 पौधे एवं उद्यानिकी विभाग द्वारा अतिरिक्त 1000 पौधे प्रदत्त किए गए। विद्यालय परिसर, आसपास के शासकीय स्थलों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में पौधों का रोपण किया गया। विद्यार्थियों, शिक्षकों, ग्रामवासियों, स्वयंसेवकों और अधिकारियों ने व्यक्तिगत रूप से पौधे अपने हाथों से रोपित किए और उन्हें अपनी मां के नाम समर्पित कर भावनात्मक जिम्मेदारी का संकल्प लिया। कई प्रतिभागियों ने अपने घरों में भी पौधों को रोपित कर उन्हें सुरक्षित रखने का वचन लिया।

इस अवसर पर डाइट पेंड्रा के प्राचार्य ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह अभियान एक प्रेरक पहल है, जिससे बच्चों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता और अपनी मां के प्रति सम्मान का भाव दोनों विकसित होंगे। उन्होंने सभी विद्यार्थियों को पौधों की नियमित देखभाल करने और उनके बड़े होने तक उनका संरक्षण करने की शपथ भी दिलाई।

वनमंडलाधिकारी कार्यालय के प्रतिनिधियों ने बताया कि वृक्षारोपण कार्यक्रम को जन आंदोलन के रूप में परिवर्तित करना समय की आवश्यकता है और इस अभियान ने बच्चों में प्रकृति से आत्मीयता का भाव जगाया है। विद्यालय के प्राचार्य, शिक्षकों एवं ग्रामवासियों ने भी पौधों की सुरक्षा के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी ली।

कार्यक्रम में “हरित भविष्य के लिए एक पौधा – मां के नाम” का नारा गूंजता रहा। बच्चों ने संकल्प लिया कि जिस प्रकार उनकी मां उनका संरक्षण करती हैं, उसी प्रकार वे अपने द्वारा लगाए पौधों का संरक्षण करेंगे ताकि आने वाली पीढ़ी को स्वच्छ वायु, हरियाली और बेहतर वातावरण मिल सके।

कार्यक्रम में बच्चों के चेहरे पर दिखी प्रसन्नता और गर्व यह साबित कर गई कि जब पर्यावरण संरक्षण में भावनात्मक जुड़ाव होता है, तब ऐसे प्रयासों की सफलता और स्थायित्व सुनिश्चित होता है।

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