जंगलों की रखवाली या सौदेबाजी? पेंड्रा में लकड़ी तस्करी पर ‘इनसाइड सेटिंग’ के आरोप”

जंगलों की रखवाली या सौदेबाजी? पेंड्रा में लकड़ी तस्करी पर ‘इनसाइड सेटिंग’ के आरोप”
गौरेला–पेंड्रा–मरवाही।पेंड्रा वन परिक्षेत्र इन दिनों एक बड़े खुलासे के केंद्र में है, जहां लकड़ी तस्करी का ऐसा नेटवर्क सामने आया है, जिसने पूरे वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप इतने गंभीर हैं कि अब यह मामला सिर्फ अवैध कटाई तक सीमित नहीं, बल्कि विभागीय संरक्षण और अंदरूनी सांठगांठ तक पहुंचता नजर आ रहा है।

स्थानीय सूत्रों का दावा है कि जंगलों में अवैध कटाई का खेल सुनियोजित तरीके से संचालित हो रहा है। देर रात से लेकर सुबह 4 बजे तक तस्कर बेखौफ होकर पेड़ों की कटाई करते हैं और लकड़ी को वाहनों में भरकर बाहर निकाल लेते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम के बावजूद वन विभाग की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आती।
“मोनू महराज”—तस्करी का ‘पासवर्ड’ या संरक्षण का संकेत?

इस पूरे नेटवर्क में “मोनू महराज” नाम एक ऐसे ‘पासवर्ड’ के रूप में सामने आया है, जो कथित तौर पर कानून को भी बेमानी बना देता है।
सूत्र बताते हैं कि जब भी लकड़ी से भरे वाहनों को रोका जाता है, तो पहला सवाल होता है—“किसका वाहन है?” और जैसे ही जवाब मिलता है—“मोनू महराज”, वहीं पर कार्रवाई रुक जाती है।

अगर यह सच है, तो यह सीधे तौर पर सिस्टम की निष्पक्षता और ईमानदारी पर सवाल खड़ा करता है।
रेंजर और स्टाफ पर उठे सवाल
वन परिक्षेत्र के रेंजर ईश्वरी खुटे और ड्यूटी रेंजर प्रकाश बंजारे की भूमिका भी अब चर्चा में है।
आरोप है कि उनकी कथित ‘सेटिंग’ के चलते तस्करों को खुली छूट मिल रही है।जंगलों से कीमती लकड़ी की कटाई लगातार जारी है, लेकिन जब्ती की कार्रवाई लगभग न के बराबर है—जो इस पूरे मामले को और संदिग्ध बनाता है।
आरा मिलों तक सीधा सप्लाई चैन
सूत्रों के मुताबिक, अवैध रूप से काटी गई लकड़ी सीधे आरा मिलों तक पहुंचाई जा रही है। इससे साफ होता है कि यह सिर्फ जंगल तक सीमित मामला नहीं, बल्कि एक संगठित सप्लाई चेन है, जिसमें कई स्तरों पर लोगों की मिलीभगत हो सकती है।
सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग के आरोप
मामले में एक और गंभीर पहलू सामने आया है—सरकारी संसाधनों का कथित दुरुपयोग।आरोप है कि वन अधिकारी नियमित रूप से सरकारी वाहन का इस्तेमाल निजी कार्यों के लिए कर रहे हैं, जिससे विभाग की जवाबदेही पर और सवाल खड़े हो रहे हैं।
बड़े सवाल, जिनका जवाब जरूरी, आखिर “मोनू महराज” कौन है, जिसका नाम लेते ही कार्रवाई ठप हो जाती है?
वन विभाग लकड़ी जब्त करने से क्यों बच रहा है? क्या तस्करी को विभाग के भीतर से ही संरक्षण मिल रहा है? क्या यह पूरा नेटवर्क उच्च स्तर तक जुड़ा हुआ है? जंगलों पर संकट, सिस्टम खामोश
लगातार हो रही अवैध कटाई से वन क्षेत्र को भारी नुकसान हो रहा है। पर्यावरण संतुलन बिगड़ने का खतरा मंडरा रहा है, लेकिन जिम्मेदार विभाग की चुप्पी इस पूरे मामले को और गंभीर बना रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह दबा दिया जाएगा? जवाब का इंतजार सिर्फ स्थानीय लोगों को नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की साख को है।















