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डिपुटेशन का ‘गोलमाल’ या सुनियोजित खेल ? बचरवार में सेवा रहा, मरवाही से वेतन—प्राचार्य शैलेन्द्र अग्निहोत्री के मामले ने खोली विभाग की पोल”

डिपुटेशन का ‘गोलमाल’ या सुनियोजित खेल ? बचरवार में सेवा रहा, मरवाही से वेतन—प्राचार्य शैलेन्द्र अग्निहोत्री के मामले ने खोली विभाग की पोल”

रायपुर/जीपीएम (मरवाही):जिले के मरवाही स्थित स्वामी आत्मानंद शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय में प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ प्राचार्य शैलेन्द्र अग्निहोत्री से जुड़ा मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। उनकी पदस्थापना, प्रतिनियुक्ति और वेतन भुगतान को लेकर ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिनसे शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पूरे मामले में वेतन घोटाले की आशंका भी जताई जा रही है।

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प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्राचार्य शैलेन्द्र अग्निहोत्री मरवाही के स्वामी आत्मानंद स्कूल में प्रतिनियुक्ति (डिपुटेशन) पर कार्यरत हैं। नियमों के मुताबिक, किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को प्रतिनियुक्ति समाप्त करने के लिए राज्य शासन को विधिवत आवेदन प्रस्तुत करना होता है। शासन ही प्रतिनियुक्ति समाप्त करते हुए उनके मूल संस्था के लिए भार मुक्त करती है।

नियमों के विपरीत संलग्न किया गया था ?

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सूत्रों का दावा है कि अग्निहोत्री ने अपनी प्रतिनियुक्ति समाप्त करने के लिए शासन को कोई आवेदन प्रस्तुत नहीं किया, इसके बावजूद उन्हें हाई स्कूल बचरवार में संलग्न कर दिया गया था। यह पूरी प्रक्रिया स्थापित नियमों के विपरीत मानी जा रही है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर किस आधार पर और किन अधिकारियों की अनुमति से यह संलग्नता की गई।

वेतन भुगतान पर बड़ा सवाल

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मामले का सबसे गंभीर पहलू वेतन भुगतान को लेकर सामने आया है। जानकारी मिल रही है कि बचरवार हाई स्कूल में कार्यरत या अटैचमेंट रहने के दौरान भी उनका वेतन मरवाही स्थित आत्मानंद स्कूल से ही जारी होता रहा। यदि यह तथ्य सही पाया जाता है, तो यह सीधे-सीधे वित्तीय अनियमितता और संभावित वेतन घोटाले का मामला बन सकता है। कार्य कही और सैलरी कही और संस्था से कैसे संभव है….?

फिर वापसी और पुनः प्राचार्य पदस्थापना

बताया जा रहा है कि बचरवार हाई स्कूल से रिलीव होने के बाद अग्निहोत्री को पुनः स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालय (सेजेस) में प्राचार्य के पद पर पदस्थ कर दिया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि उनकी मूल प्रतिनियुक्ति समाप्ति की प्रक्रिया अब भी स्पष्ट नहीं है, जिससे पूरे घटनाक्रम की वैधता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है।

उठ रहे हैं कई अहम सवाल, इस पूरे प्रकरण ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—

बिना प्रतिनियुक्ति समाप्त किए दूसरी जगह संलग्नत कैसे संभव हुई?बचरवार में कार्यरत रहने के दौरान मरवाही से वेतन क्यों और कैसे जारी रहा?क्या इस प्रक्रिया में विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत है?क्या उच्च स्तर पर इसकी जानकारी थी या नियमों को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया?

स्थानीय स्तर पर अब इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग जोर पकड़ने लगी है। शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई है। यदि समय रहते इस मामले की पारदर्शी जांच नहीं कराई गई, तो यह प्रकरण बड़े वित्तीय घोटाले का रूप ले सकता है।

मरवाही का यह मामला केवल एक अधिकारी की पदस्थापना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे शिक्षा तंत्र की पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमों के पालन पर सवाल खड़ा करता है।

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