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मरीज ठीक, नवजात स्वस्थ… फिर भी अस्पताल पर संगीन आरोप – CCTV और दस्तावेज़ बने गवाह”

मरीज ठीक, नवजात स्वस्थ… फिर भी अस्पताल पर संगीन आरोप – CCTV और दस्तावेज़ बने गवाह”

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले में निजी स्वास्थ्य सेवाओं के सामने एक नया और खतरनाक खतरा तेजी से पनप रहा है — मरीज का इलाज करा लो, बिल चुका दो, और फिर अस्पताल को ब्लैकमेल कर पैसा वापस ले लो। ताज़ा मामला गौरेला के पिनाकी शोभा हॉस्पिटल एंड मेटरनिटी केयर का है, जहां अस्पताल प्रबंधन का दावा है कि इलाज पूरी तरह अधिकृत और योग्य डॉक्टर द्वारा किया गया, लेकिन इसके बावजूद मरीज के परिजनों ने राजनीतिक दबाव और फर्जी आरोपों के जरिए भुगतान वापस लेने की सुनियोजित कोशिश की। इस संबंध में अस्पताल ने गौरेला थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराते हुए दोषी पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

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पूरा मामला 3 अगस्त 2025 का है, जब कोरबा जिले के ग्राम पसान निवासी श्रीमती खामेश्वरी प्रजापति को प्रसव के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल के अनुसार, पूरा उपचार एक वरिष्ठ, पंजीकृत और पूरी तरह योग्य डॉक्टर द्वारा किया गया। इलाज शुरू करने से पहले मरीज के परिजनों को खर्च और प्रक्रिया की पूरी जानकारी दी गई, सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कराए गए और सभी मेडिकल दस्तावेज़ व CCTV फुटेज इस बात का पुख्ता सबूत हैं कि उपचार पूरी तरह नियमों के तहत और सुरक्षित माहौल में हुआ। डिस्चार्ज के समय मरीज और नवजात पुत्र दोनों स्वस्थ थे, यहां तक कि अस्पताल द्वारा बताई गई कुछ दवाइयाँ भी परिजनों ने बाहर से नहीं खरीदीं, जो इस बात का संकेत है कि इलाज पर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी।

अस्पताल प्रबंधन का आरोप है कि डिस्चार्ज के बाद मरीज का पति, जितेंद्र प्रजापति, बिल के भुगतान में टालमटोल करने लगा और लगातार राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की। CCTV फुटेज में साफ दिख रहा है कि वह महिला वार्ड में नियम विरुद्ध ठहरता रहा, स्टाफ के साथ अभद्र व्यवहार करता रहा और बार-बार अस्पताल के प्रोटोकॉल तोड़ता रहा। जब स्टाफ ने उसे नियमों की जानकारी दी, तो उसने खुद को लॉ का छात्र बताते हुए खुलेआम धमकी दी — “यहां से निकलने दो, फिर तुम्हें और तुम्हारे मालिक को कानून की भाषा में सबक सिखाऊंगा।”

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अस्पताल का कहना है कि यह सब पहले से तय ब्लैकमेल प्लान का हिस्सा था। कुछ दिनों बाद जितेंद्र प्रजापति ने जिला पुलिस अधीक्षक को शिकायत दी, जिसमें अस्पताल संचालक (जो डॉक्टर हैं लेकिन MBBS नहीं) पर बिना अनुमति इलाज, जबरन वसूली और धमकी देने जैसे संगीन आरोप लगाए। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि इलाज में संचालक की कोई प्रत्यक्ष भूमिका ही नहीं थी और लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह झूठे हैं। उनके पास मेडिकल रिकॉर्ड, सहमति पत्र, भुगतान रसीद और CCTV फुटेज जैसे मजबूत सबूत मौजूद हैं, जो इस शिकायत को तथ्यहीन साबित करते हैं।

अस्पताल ने गौरेला थाने में दी गई अपनी शिकायत में कहा है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति द्वारा भुगतान वापस लेने की साजिश नहीं, बल्कि निजी चिकित्सा संस्थानों के खिलाफ चल रही एक खतरनाक प्रवृत्ति का हिस्सा है। प्रबंधन ने चेतावनी दी है कि अगर इस तरह के “फर्जी शिकायत माफिया” पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई, तो जिले के हर निजी अस्पताल को इसी तरह के ब्लैकमेल का सामना करना पड़ेगा।

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यह मामला केवल पैसों की वसूली या एक अस्पताल की प्रतिष्ठा का नहीं है, बल्कि पूरे निजी स्वास्थ्य तंत्र की साख और भविष्य से जुड़ा हुआ है। प्रशासन के सामने अब चुनौती यह है कि वह समय रहते इस प्रवृत्ति पर लगाम लगाए और दोषियों के खिलाफ ऐसी मिसाल कायम करे, जिससे कोई भी व्यक्ति इलाज के बाद अस्पताल को ब्लैकमेल करने की हिम्मत न कर सके। सवाल यह है कि क्या कार्रवाई होगी, और क्या निजी स्वास्थ्य सेवाओं को इस नए खतरे से बचाया जा सकेगा, या फिर इलाज के बाद वसूली का यह गंदा खेल एक “नई बीमारी” बनकर फैलता रहेगा।

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