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अब नहीं चलेगी ‘छात्रावास ड्यूटी’ की आड़… स्कूल से गायब शिक्षकों पर गिरेगी बर्खास्तगी की गाज!”

“अब नहीं चलेगी ‘छात्रावास ड्यूटी’ की आड़… स्कूल से गायब शिक्षकों पर गिरेगी बर्खास्तगी की गाज!”

लोक शिक्षण संचालनालय का बड़ा एक्शन — मूल संस्था छोड़ वर्षों से गायब शिक्षकों की अब खैर नहीं

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खबर का असर : छात्रावास अधीक्षक बनकर स्कूलों से गायब रहने वाले शिक्षक भी रडार पर, केवल सस्पेंड नहीं अब सीधे सेवा से बाहर करने की तैयारी

रायपुर/छत्तीसगढ़ के शिक्षा विभाग में वर्षों से चल रही मनमानी, फर्जी उपस्थिति और “अटैचमेंट संस्कृति” पर अब शासन ने सबसे बड़ा प्रहार कर दिया है। लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा जारी कड़े और विस्तृत आदेश ने उन शिक्षकों की नींद उड़ा दी है जो छात्रावास अधीक्षक या अन्य व्यवस्थाओं की आड़ लेकर अपने मूल विद्यालयों से लगातार गायब चल रहे थे।
26 मई 2026 को जारी इस लंबे निर्देशात्मक पत्र में साफ शब्दों में कहा गया है कि अनाधिकृत अनुपस्थिति और कर्तव्य विमुखता अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। एक माह से अधिक अनुपस्थित रहने वाले कर्मचारियों पर विभागीय कार्रवाई होगी, जबकि लगातार लंबे समय तक गायब रहने वालों को सीधे सेवा से पृथक तक किया जा सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि आदेश में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि ऐसे मामलों में केवल निलंबन पर्याप्त नहीं माना जाएगा।
अब “स्कूल छोड़ो, छात्रावास संभालो” मॉडल पर संकट
शिक्षा विभाग में लंबे समय से यह शिकायत उठती रही है कि कई शिक्षक छात्रावास अधीक्षक (शिक्षक) के रूप में पदस्थ होकर अपने मूल स्कूलों में पढ़ाने नहीं जाते। कई गांवों के स्कूलों में शिक्षक पदस्थ हैं, लेकिन बच्चे बिना पढ़ाई के लौट रहे हैं। कहीं एक शिक्षक पूरे स्कूल का बोझ उठा रहा है तो कहीं स्कूल नाम का भवन है, पर पढ़ाने वाला कोई नहीं।
आरोप यह भी रहे हैं कि कुछ शिक्षक केवल छात्रावास में उपस्थिति दर्ज कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं, जबकि उनकी वास्तविक नियुक्ति स्कूल में अध्यापन के लिए होती है। इस व्यवस्था ने ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी है। अब संचालनालय के आदेश के बाद ऐसे मामलों में सीधे कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है।

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लंबे पत्र में क्या-क्या कहा गया…?

लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा जारी विस्तृत आदेश में छत्तीसगढ़ शासन सामान्य प्रशासन विभाग के पूर्व निर्देशों और सिविल सेवा नियमों का हवाला देते हुए कई महत्वपूर्ण बिंदु स्पष्ट किए गए हैं—
एक माह से अधिक अनाधिकृत अनुपस्थिति को “सेवा में व्यवधान” माना जाएगा।
अनुपस्थित अवधि में किसी प्रकार का अवकाश स्वीकृत नहीं होगा।
विभागीय जांच कर “दीर्घ शास्ति” दी जा सकती है।
जांच के दौरान निलंबन आवश्यक नहीं माना गया है।
लगातार तीन वर्ष तक अनुपस्थित रहने वाले कर्मचारियों को सेवा से पृथक करने की कार्रवाई संभव होगी। संबंधित अधिकारियों द्वारा कार्रवाई नहीं करने पर उनकी भी जिम्मेदारी तय होगी।
यानी अब “फाइल दबाओ और मामला शांत करो” वाला दौर खत्म करने का संकेत साफ दिखाई दे रहा है।
जिन स्कूलों में शिक्षक नहीं पहुंचे, वहां बच्चों का भविष्य बर्बाद
ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में सबसे अधिक शिकायतें ऐसे शिक्षकों की रही हैं जो वर्षों से मूल संस्था में नहीं पहुंचे। कई स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या दर्ज है, लेकिन नियमित पढ़ाई नहीं होती। पालकों और जनप्रतिनिधियों द्वारा लगातार शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने से विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं।
अब इस आदेश को उन शिकायतों और लगातार सामने आ रही खबरों का सीधा असर माना जा रहा है। शिक्षा विभाग के भीतर चर्चा है कि कई जिलों में ऐसे शिक्षकों की सूची तैयार की जा रही है जो कागजों में स्कूल में पदस्थ हैं लेकिन वास्तविकता में वहां कभी दिखाई नहीं देते।

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“सस्पेंड करके बचाने” की व्यवस्था पर भी सवाल

शिक्षा विभाग में अक्सर देखा गया कि गंभीर मामलों में भी केवल निलंबन की औपचारिक कार्रवाई कर मामला वर्षों तक लटकाया जाता रहा। कई कर्मचारी निलंबन अवधि पूरी होने के बाद फिर बहाल हो जाते थे। लेकिन इस बार संचालनालय के आदेश ने स्पष्ट कर दिया है कि लगातार कर्तव्य से विमुख रहने वालों पर सीधी कठोर कार्रवाई होगी।
यानी अब स्कूल से गायब रहने वाले शिक्षकों को सिर्फ सस्पेंड कर बचाने का रास्ता आसान नहीं रहेगा। यदि अनुपस्थिति और लापरवाही सिद्ध हुई तो सेवा समाप्ति तक की कार्रवाई हो सकती है।
अधिकारियों पर भी गिरेगी गाज
इस आदेश का सबसे बड़ा संदेश अधिकारियों के लिए भी माना जा रहा है। संचालनालय ने साफ कहा है कि यदि कार्यालय प्रमुख या जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई नहीं करते तो उनकी जवाबदेही भी तय होगी। इससे उन अधिकारियों में भी बेचैनी बढ़ गई है जो वर्षों से ऐसे मामलों को नजरअंदाज करते रहे।

शिक्षा विभाग में मचा हड़कंप, आदेश जारी होने के बाद कई जिलों के शिक्षा कार्यालयों में हलचल तेज हो गई है। उपस्थिति पंजियों, वास्तविक कार्यस्थल और अध्यापन व्यवस्था की समीक्षा शुरू होने की चर्चा है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में कई शिक्षकों और जिम्मेदार अधिकारियों पर बड़ी कार्रवाई देखने को मिल सकती है।
शासन के इस सख्त रुख ने साफ कर दिया है कि अब सरकारी नौकरी लेकर स्कूलों से गायब रहने वालों के दिन आसान नहीं रहेंगे। अब सवाल यही है कि क्या यह कार्रवाई वास्तव में जमीनी स्तर तक पहुंचेगी या फिर पुराने मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगी।

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