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शिक्षा विभाग की मनमानी पर हाईकोर्ट का बड़ा ब्रेक! व्याख्याता की कार्यमुक्ति पर रोक, सचिव से लेकर डीईओ तक जवाब तलब

युक्तियुक्तकरण पर हाईकोर्ट का बड़ा झटका! व्याख्याता की कार्यमुक्ति पर लगी रोक, शिक्षा विभाग से मांगा जवाब

रिक्त पद की जांच किए बिना जारी हुआ आदेश, हाईकोर्ट ने कहा—फिलहाल पुराने स्कूल में ही करेंगे कार्यभार

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बिलासपुर, 1 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ में शिक्षा विभाग के युक्तियुक्तकरण (रैशनलाइजेशन) की कार्रवाई पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सूरजपुर जिले के व्याख्याता सत्यप्रकाश दुबे को उनके मूल विद्यालय के लिए कार्यमुक्त किए जाने के आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए शिक्षा विभाग को कड़ा झटका दिया है। अदालत ने शिक्षा सचिव, लोक शिक्षण संचालनालय के संचालक, कलेक्टर सूरजपुर और जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) सूरजपुर को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। मामला सूरजपुर जिले के ओड़गी विकासखंड स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय दवना में पदस्थ व्याख्याता (गणित) सत्यप्रकाश दुबे का है। डीईओ सूरजपुर ने 15 जुलाई 2026 को उन्हें उनके मूल विद्यालय शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, भटगांव के लिए कार्यमुक्त कर दिया था।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता वेदांत षडंगी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि वर्ष 2021 में उनकी पहली नियुक्ति भटगांव स्कूल में हुई थी, लेकिन वहां व्याख्याता (गणित) का पद रिक्त नहीं होने के कारण स्वयं जिला शिक्षा अधिकारी ने 6 जुलाई 2021 को उन्हें दवना स्कूल में पदस्थ किया था। तब से वे लगातार वहीं सेवाएं दे रहे हैं।

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याचिका में यह भी बताया गया कि राज्य सरकार की युक्तियुक्तकरण सूची में उनका नाम अतिशेष (सरप्लस) कर्मचारियों में शामिल नहीं था। इसके बावजूद मूल विद्यालय में रिक्त पद की वास्तविक स्थिति की जांच किए बिना कार्यमुक्ति आदेश जारी कर दिया गया, जो नियमों के विपरीत है। 28 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति विभू दत्ता गुरु की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के पक्ष में राहत दी। अदालत ने डीईओ के कार्यमुक्ति आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी और सत्यप्रकाश दुबे को फिलहाल शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय दवना में ही कार्यभार ग्रहण करने की अनुमति दे दी।

इस आदेश के बाद शिक्षा विभाग की युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया और कार्यमुक्ति आदेशों की वैधता पर फिर बहस तेज हो गई है। यदि अंतिम सुनवाई में भी याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला आता है, तो ऐसे कई आदेशों पर कानूनी सवाल खड़े हो सकते हैं।

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