“आवास के लिए अफसर के पैरों में गिरा कमार दंपति” — सुशासन तिहार में छलका सिस्टम का सच, पीएम आवास के लिए दया की भीख मांगते दिखे राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र

“आवास के लिए अफसर के पैरों में गिरा कमार दंपति” — सुशासन तिहार में छलका सिस्टम का सच, पीएम आवास के लिए दया की भीख मांगते दिखे राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र
“शर्मनाक! पीएम आवास के लिए अफसर के पैरों में गिरा आदिवासी दंपति, सुशासन का नकाब उतरा”

गरियाबंद, 9 मई 2026। छत्तीसगढ़ सरकार भले ही “सुशासन तिहार” के जरिए योजनाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने के दावे कर रही हो, लेकिन गरियाबंद जिले के देवभोग ब्लॉक से सामने आई एक तस्वीर ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेनकाब कर दिया। यहां राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समाज के एक गरीब दंपति को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर पाने के लिए जिला पंचायत सीईओ के पैरों में गिरकर गुहार लगानी पड़ी।यह दृश्य सिर्फ एक परिवार की मजबूरी नहीं था, बल्कि उस सरकारी तंत्र पर बड़ा सवाल था, जो कागजों में योजनाओं का ढिंढोरा पीटता है और जमीन पर गरीबों को दर-दर भटकने छोड़ देता है।
“साहब… बस रहने के लिए एक घर दिला दो”

देवभोग ब्लॉक के माडागांव में आयोजित जन समस्या निवारण शिविर में शासन के लगभग सभी विभागों के स्टॉल लगे थे। अधिकारी मौजूद थे, योजनाओं की जानकारी दी जा रही थी, उपलब्धियों के पोस्टर चमक रहे थे। लेकिन इसी भीड़ के बीच बरही गांव से पहुंचे कमार जनजाति के एक गरीब दंपति ने ऐसा कदम उठाया कि पूरा शिविर कुछ पल के लिए सन्न रह गया।
दंपति सीधे जिला पंचायत सीईओ के पास पहुंचे और उनके पैरों पर गिर पड़े। दोनों दंडवत मुद्रा में जमीन पर लेट गए। आंखों में आंसू, चेहरे पर बेबसी और जुबान पर सिर्फ एक मांग — “हमें रहने के लिए घर चाहिए।”मौके पर मौजूद लोग यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। किसी की हिम्मत नहीं हुई कि कुछ बोल सके। यह केवल भावनात्मक दृश्य नहीं था, बल्कि प्रशासनिक असफलता का जीवंत प्रमाण था।

महीनों से कार्यालयों के चक्कर, फिर भी नहीं मिला आवास
बताया जा रहा है कि यह दंपति कई महीनों से प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर की मांग को लेकर पंचायत से लेकर जनपद और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा था। लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला, समाधान नहीं।जब सारी उम्मीदें टूट गईं, तब उन्होंने सुशासन तिहार के मंच को अंतिम उम्मीद माना। मगर यहां भी उन्हें अपनी पीड़ा सुनाने के लिए अफसरों के सामने गिरना पड़ा।
जिला पंचायत सीईओ ने मामले में आश्वासन देते हुए जनपद पंचायत सीईओ और ग्राम पंचायत सचिव को जांच कर तत्काल रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर शिविर नहीं लगता, कैमरे नहीं पहुंचते, तो क्या इस गरीब परिवार की सुनवाई होती?
आखिर योजनाएं पहुंच कहां रही हैं?
केंद्र और राज्य सरकार विशेष पिछड़ी जनजातियों के उत्थान के लिए करोड़ों रुपए खर्च करने का दावा करती हैं। कमार जैसी जनजातियों को विशेष संरक्षण, खाद्यान्न, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य योजनाओं में प्राथमिकता देने की बात कही जाती है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन्हीं समुदायों के लोग आज भी एक छत के लिए अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाने को मजबूर हैं।
यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है- क्या पंचायत स्तर पर हितग्राहियों का सत्यापन सही तरीके से हो रहा है- क्या पात्र हितग्राहियों के नाम जानबूझकर सूची से बाहर रखे जा रहे हैं- क्या गरीबों को योजना का लाभ दिलाने के बजाय फाइलों में उलझाया जा रहा है- क्या “सुशासन” सिर्फ मंच और भाषणों तक सीमित रह गया है?
शिविर में फूटा ग्रामीणों का गुस्सा
माडागांव शिविर में केवल एक दंपति ही नहीं, बल्कि कई ग्रामीणों ने पीएम आवास योजना में गड़बड़ी की शिकायत की। किसी ने कहा कि राशि स्वीकृत होने के बावजूद किस्त नहीं मिली, तो किसी ने आरोप लगाया कि सूची में नाम होने के बाद भी आवास नहीं बना।ग्रामीणों का कहना है कि कई पात्र परिवार वर्षों से इंतजार कर रहे हैं, जबकि अपात्र लोगों को लाभ मिल गया।
“बोगस जियो टैगिंग” ने खोली भ्रष्टाचार की परतें
देवभोग क्षेत्र में हाल ही में प्रधानमंत्री आवास योजना में बड़े फर्जीवाड़े का मामला भी सामने आया था। शिकायतों के बाद जांच में “बोगस जियो टैगिंग” और रिकॉर्ड में गड़बड़ी की पुष्टि हुई थी। मामले को गंभीर मानते हुए कलेक्टर ने तीन आवास मित्रों को बर्खास्त कर दिया था। इस कार्रवाई ने साफ कर दिया कि योजना में गड़बड़ियां केवल तकनीकी नहीं, बल्कि संगठित लापरवाही और भ्रष्टाचार का हिस्सा बन चुकी हैं।
सुशासन के दावों पर बड़ा सवाल
जिस राज्य में विशेष पिछड़ी जनजाति का परिवार एक छत के लिए अफसरों के पैरों में गिरने को मजबूर हो जाए, वहां “सुशासन” के दावों की वास्तविकता खुद सामने आ जाती है। सरकार योजनाएं बना रही है, बजट जारी हो रहा है, शिविर लग रहे हैं, भाषण हो रहे हैं — लेकिन अगर अंतिम व्यक्ति तक उसका लाभ नहीं पहुंच रहा, तो यह पूरे सिस्टम की सामूहिक विफलता है।गरियाबंद की यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस दर्दनाक सच्चाई का आईना है, जिसमें गरीब आज भी सम्मान नहीं, दया मांगने को मजबूर है।














