LIVE UPDATE
झमाझम खबरें

तबादला मुंगेली, नौकरी बिलासपुर में!” — आदिम जाति विकास विभाग में अटैचमेंट का खेल जारी, सरकार के आदेश को ठेंगा..?

सरकार ने कहा खत्म करो अटैचमेंट, विभाग ने कहा जारी रहेगा खेल!”

आदिम जाति विकास विभाग में तबादला आदेश बना मजाक, मुंगेली ट्रांसफर के 11 दिन बाद फिर बिलासपुर में अटैच हुआ कर्मचारी, अब उठ रहे बड़े सवाल

ये खबर भी पढ़ें…
सेवाभाव और संकल्प की मिसाल : मिनपा स्वास्थ्य केंद्र को राष्ट्रीय पहचान
सेवाभाव और संकल्प की मिसाल : मिनपा स्वास्थ्य केंद्र को राष्ट्रीय पहचान
May 20, 2026
सेवाभाव और संकल्प की मिसाल : मिनपा स्वास्थ्य केंद्र को राष्ट्रीय पहचान रायपुर, 20 मई 2026/सुकमा जिले का मिनपा क्षेत्र...
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ सरकार ने नई तबादला नीति लागू करते हुए पूरे प्रशासनिक सिस्टम में वर्षों से चल रहे “अटैचमेंट कल्चर” पर सख्ती दिखाने का दावा किया था। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने साफ शब्दों में निर्देश जारी किए थे कि किसी भी कर्मचारी को मूल पदस्थापना से अलग अटैच रखने की व्यवस्था तत्काल खत्म की जाए। यहां तक कहा गया था कि यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी को अटैच किया गया है तो उसे तत्काल रिलीव कर उसके मूल कार्यालय भेजा जाए।

लेकिन सरकार के आदेशों की असलियत अब विभागों में खुलकर सामने आने लगी है। आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सरकार की मंशा और विभागीय अफसरों की कार्यशैली दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक कर्मचारी का विधिवत तबादला तो मुंगेली कर दिया गया, लेकिन महज 11 दिनों के भीतर उसे फिर से बिलासपुर कार्यालय में अटैच कर दिया गया। अब यह मामला पूरे विभाग में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग पूछ रहे हैं कि आखिर नियम सिर्फ आम कर्मचारियों के लिए ही हैं क्या?

ये खबर भी पढ़ें…
आत्मनिर्भरता, पोषण और बदलाव की नई पहचान बनीं महिला स्व-सहायता समूह
आत्मनिर्भरता, पोषण और बदलाव की नई पहचान बनीं महिला स्व-सहायता समूह
May 20, 2026
आत्मनिर्भरता, पोषण और बदलाव की नई पहचान बनीं महिला स्व-सहायता समूह रायपुर, 20 मई 2026/छत्तीसगढ़ में महिला सशक्तिकरण और कुपोषण...
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

तबादला आदेश जारी, लेकिन कर्मचारी नहीं गया नई पदस्थापना

जानकारी के मुताबिक आयुक्त आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग द्वारा 15 सितंबर 2025 को तबादला आदेश जारी किया गया था। इस आदेश में विभाग के 10 कर्मचारियों के नाम शामिल थे। सूची में शिव नारायण यादव, कनिष्ठ लेखा अधिकारी, कार्यालय सहायक आयुक्त आदिवासी विकास बिलासपुर का भी नाम था। आदेश के तहत उनका तबादला बिलासपुर से मुंगेली कर दिया गया था। सामान्य रूप से किसी भी कर्मचारी को निर्धारित समय सीमा में नई पदस्थापना पर जॉइन करना होता है, लेकिन यहां कहानी कुछ और ही निकली। सूत्र बताते हैं कि तबादला आदेश जारी होने के बाद भी कर्मचारी ने प्रभाव और पहुंच के दम पर विभागीय स्तर पर सक्रियता बढ़ा दी। नतीजा यह हुआ कि मुंगेली में व्यवस्थित रूप से जॉइनिंग होने से पहले ही नया आदेश निकल गया।

ये खबर भी पढ़ें…
सुशासन के दावों की खुली पोल : चंगेरी में बूंद-बूंद पानी को तरसे ग्रामीण, सचिव की लापरवाही से गहराया जल संकट
सुशासन के दावों की खुली पोल : चंगेरी में बूंद-बूंद पानी को तरसे ग्रामीण, सचिव की लापरवाही से गहराया जल संकट
May 20, 2026
सुशासन के दावों की खुली पोल : चंगेरी में बूंद-बूंद पानी को तरसे ग्रामीण, सचिव की लापरवाही से गहराया जल...
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

11 दिन बाद ही जारी हुआ नया आदेश

तबादले के महज 11 दिन बाद यानी 26 सितंबर 2025 को सचिव आदिम जाति विकास विभाग की ओर से एक नया आदेश जारी किया गया। इस आदेश ने पूरे मामले को विवादों में ला दिया। आदेश में कहा गया कि शिव नारायण यादव, कनिष्ठ लेखा अधिकारी, कार्यालय सहायक आयुक्त आदिवासी विकास जिला मुंगेली को “वर्तमान कर्तव्यों के साथ-साथ अस्थाई रूप से आगामी आदेश पर्यन्त” कार्यालय सहायक आयुक्त आदिवासी विकास जिला बिलासपुर में कार्य की अधिकता को देखते हुए कार्य संपादन हेतु आदेशित किया जाता है। सीधे शब्दों में कहें तो ट्रांसफर मुंगेली का हुआ, लेकिन काम बिलासपुर में ही चलता रहा। अब सवाल यही उठ रहा है कि जब कर्मचारी को बिलासपुर में ही रखना था तो फिर तबादला किया ही क्यों गया?

सरकार के आदेश को विभाग ने दिखाया ठेंगा?

सबसे बड़ा सवाल इस पूरे मामले में सामान्य प्रशासन विभाग के आदेशों को लेकर उठ रहा है। जीएडी ने राज्य के सभी विभागों को स्पष्ट निर्देश जारी कर कहा था कि अटैचमेंट की व्यवस्था समाप्त की जाए। विभाग प्रमुखों को लिखे पत्र में यह भी कहा गया था कि यदि कोई कर्मचारी अटैच है तो उसे तत्काल प्रभाव से रिलीव कर मूल पदस्थापना वाले कार्यालय भेजा जाए।

लेकिन आदिम जाति विकास विभाग में स्थिति इसके ठीक उलट दिखाई दे रही है। यहां न केवल अटैचमेंट जारी है, बल्कि तबादला आदेश के तुरंत बाद ही अटैचमेंट का नया आदेश जारी कर दिया गया। इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि विभागीय स्तर पर सरकार के निर्देशों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि यदि किसी सामान्य कर्मचारी ने आदेश का पालन नहीं किया होता तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई तय मानी जाती, लेकिन यहां पूरा सिस्टम ही नियमों को “मैनेज” करता नजर आ रहा है।

“काम की अधिकता” या पसंदीदा कर्मचारियों को बचाने का बहाना?

सचिव द्वारा जारी आदेश में बिलासपुर कार्यालय में “कार्य की अधिकता” का हवाला दिया गया है। लेकिन अब इसी तर्क पर सवाल उठ रहे हैं। कर्मचारियों और विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि वास्तव में बिलासपुर कार्यालय में काम का इतना अधिक दबाव है तो वहां नियमित रूप से अतिरिक्त पद स्वीकृत क्यों नहीं किए जाते? यदि स्टाफ की कमी है तो नई पदस्थापना क्यों नहीं की जाती? आखिर एक ट्रांसफर किए गए कर्मचारी को ही रोकने की जरूरत क्यों पड़ गई?

सूत्रों का यह भी कहना है कि विभाग में कुछ चुनिंदा कर्मचारियों को वर्षों से विशेष संरक्षण मिलता रहा है। तबादले के आदेश निकलते हैं, लेकिन बाद में अटैचमेंट, प्रतिनियुक्ति या विशेष आदेश के जरिए उन्हें वहीं बनाए रखा जाता है जहां वे रहना चाहते हैं। आठ महीने से ज्यादा समय से जारी है व्यवस्था,बताया जा रहा है कि यह अटैचमेंट पिछले आठ महीने से अधिक समय से जारी है। यानी सरकार द्वारा अटैचमेंट खत्म करने की मंशा जाहिर करने के बावजूद विभाग में पुराने तरीके से ही काम चल रहा है।

यही वजह है कि अब यह मामला सिर्फ एक कर्मचारी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरे प्रशासनिक सिस्टम पर सवाल खड़े कर रहा है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या सरकार के आदेश सिर्फ फाइलों तक सीमित हैं? क्या प्रभावशाली कर्मचारियों के लिए अलग नियम बनाए गए हैं? और क्या विभागीय अफसर अपनी सुविधा के हिसाब से आदेशों की व्याख्या कर रहे हैं?

इस पूरे मामले ने आदिम जाति विकास विभाग की कार्यप्रणाली को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक तरफ सरकार पारदर्शिता, प्रशासनिक कसावट और जवाबदेही की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ विभागीय स्तर पर उन्हीं आदेशों को कमजोर किया जा रहा है।प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार वास्तव में अटैचमेंट व्यवस्था खत्म करना चाहती है तो उसे ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई करनी होगी। वरना हर विभाग “काम की अधिकता” और “प्रशासनिक आवश्यकता” का बहाना बनाकर अपने पसंदीदा कर्मचारियों को मनचाही जगहों पर बनाए रखेगा।

अब सबकी नजर सरकार की कार्रवाई पर

फिलहाल इस मामले ने बिलासपुर से लेकर विभागीय मुख्यालय तक हलचल बढ़ा दी है। कर्मचारी संगठन भी अंदरखाने इस व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार और विभाग के उच्च अधिकारी इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं। क्या नियमों को ताक पर रखकर जारी अटैचमेंट खत्म होगा? क्या संबंधित आदेश की समीक्षा होगी? या फिर यह मामला भी बाकी फाइलों की तरह दबा दिया जाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में तय करेंगे कि छत्तीसगढ़ सरकार की “अटैचमेंट खत्म करने” की नीति वास्तव में जमीन पर लागू हुई है या सिर्फ कागजों और प्रेस नोट तक सीमित रह गई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!