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कर्मचारियों के रिश्तेदार बने कागज़ी मजदूर—मरवाही वनमंडल में बैंक खातों के सहारे करोड़ों की बंदरबांट का बड़ा खुलासा !

कर्मचारियों के रिश्तेदार बने कागज़ी मजदूर—मरवाही वनमंडल में बैंक खातों के सहारे करोड़ों की बंदरबांट का बड़ा खुलासा !

रायपुर _जीपीएम।मरवाही वनमण्डल में मजदूरी भुगतान के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपये के गबन का गंभीर मामला उजागर होने की बात सामने आ रही है। सूत्र बताते हैं कि वन परिक्षेत्र मरवाही, गौरेला, पेंड्रा और खोड़री में मैदानी वन कर्मियों ने वास्तविक मजदूरों की जगह अपने रिश्तेदारों और नज़दीकी लोगों के बैंक खातों में लाखों रुपये जमा कराए, जबकि जिन लोगों के खातों में राशि गई, वे मजदूरी कार्य से जुड़े ही नहीं थे। खाते से भुगतान शुरू होते ही खुला ‘घोटाले का रास्ता’वन विभाग में नगद भुगतान बंद कर खाते के माध्यम से भुगतान अनिवार्य किए जाने के बाद से ही मैदानी स्तर पर गबन की यह नई प्रणाली विकसित होने का आरोप है। यह मामल बीते वर्षों की कहानी बता रहा रहा है..?

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वन विभाग में सुकृत कार्यों का भुगतान दो हिस्सों में होता है—

 सामग्री (Material) का भुगतान,.मजदूरी (Labour) का भुगतान

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1.सामग्री भुगतान में गड़बड़ी — पसंदीदा फर्मों को लाभ!
उच्च अधिकारियों के संरक्षण में पसंदीदा फर्मों को टेंडर दिया जाता है,कम मात्रा में सामग्री मंगाई जाती है,फर्जी बिल बनाकर पूरा भुगतान करवाया जाता है,और बची राशि की बंदरबांट होती है।

2.मजदूरी भुगतान — मैदानी अमले पर गंभीर आरोप मजदूरी भुगतान प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका होती है—परिसर रक्षक,परिक्षेत्र सहायक,परिक्षेत्र अधिकारी की।आरोप है कि इसी तंत्र के तहत गबन किया गया:परिसर रक्षक मजदूरी कार्य की सूची तैयार करता है,परिक्षेत्र सहायक इसे अप्रूव करता है,

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परिक्षेत्र अधिकारी सूची में दर्ज नामों के बैंक खातों में राशि जमा कर देता है। वास्तविक मजदूरों को उनके काम के अनुसार भुगतान हुआ, लेकिन फर्जी नामों पर ₹10,000 से ₹1,00,000 तक रकम डाली गई।

जिन खातों में पैसा पहुंचा:वे लोग मजदूर नहीं, बल्कि कर्मियों के रिश्तेदार या परिचित बताए जा रहे हैं। प्रत्येक खाते के धारक को कुल राशि में से 10% कमीशन दिया जाता है।इसके बाद उनसे पूरी राशि नकद निकलवाकर वापस ले ली जाती है। इसी प्रक्रिया से वर्षों में करोड़ों रुपये की सरकारी राशि कथित रूप से गबन की गई।

RTI में जानकारी देने से इनकार_____

जब लोगों ने मजदूरी भुगतान का विवरण माँगा, तो विभाग ने इसे “गोपनीय दस्तावेज” बताकर RTI के तहत जानकारी देने से साफ मना कर दिया। स्थानीय लोग कहते हैं कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि बड़े घोटाले की परतें न खुलें। शिकायतों के बाद भी जांच नहीं -कई बार शिकायतें होने के बावजूद अब तक वन विभाग द्वारा कोई ठोस विभागीय जांच नहीं शुरू की गई सबताते है की“यदि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो जाए, तो 90% कर्मचारी और अधिकारी जेल पहुंच सकते हैं।”

विकास का पैसा मजदूरों तक नहीं—सिर्फ कर्मचारियों तक सीमित!

इस कथित घोटाले के कारण जो राशि वन संरक्षण एवं मजदूरी कार्यों पर खर्च होनी थी, वह गरीब मजदूरों तक पहुंचने के बजाय
वन कर्मियों और अधिकारियों की जेब तक सीमित रह गई।

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