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नियमों की खुली धज्जियां: अटैचमेंट बंद होने के बावजूद कोरजा स्कूल से हिंदी व्याख्याता को किया गया अटैच, छात्रों की पढ़ाई पर सीधा वार…!

नियमों की खुली धज्जियां: अटैचमेंट बंद होने के बावजूद कोरजा स्कूल से हिंदी व्याख्याता को किया गया अटैच, छात्रों की पढ़ाई पर सीधा वार…!

गौरेला–पेण्ड्रा–मरवाही (GPM) जिले की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। गौरेला विकासखंड के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कोरजा में पदस्थ हिंदी व्याख्याता संतोष चन्द्रा को महीनों से जिला प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) में अटैच कर रखा गया है और इसी तरह से मुकेश कोरी व्याख्याता स्वामी आत्मानंद स्कूल धनौली को भी जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में आए दिन देखा जा सकता है जबकि अभी बोर्ड परीक्षाये नजदीक हैं और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।जबकि इसके लिए राज्य शासन पहले ही सभी प्रकार के अटैचमेंट समाप्त करने के स्पष्ट निर्देश जारी कर चुका है। इसके बावजूद नियमों को ताक में रखकर यह अटैचमेंट जारी रहना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। इसी तरह से कुछ दिन पूर्व बीईओ गौरेला संजीव शुक्ला द्वारा अपने एक चहेते शिक्षक को अपने स्तर से ही अटैच कर लिया गया।
आदेश कागज पर, मनमानी जमीन पर!

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जब सरकार अटैचमेंट खत्म करने का आदेश दे चुकी है, तो फिर किसके संरक्षण में यह अटैचमेंट चल रहा है? क्या शासन के निर्देश सिर्फ फाइलों तक सीमित हैं? कोरजा जैसे ग्रामीण अंचल के स्कूल से हिंदी जैसे मुख्य विषय के व्याख्याता को हटाना सीधे तौर पर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं तो और क्या है ? निरीक्षण और नोटिस की दिखावटी सख्ती?
एक ओर जिला शिक्षा अधिकारी रजनीश तिवारी विद्यालयों का निरीक्षण कर अनुपस्थित शिक्षकों को नोटिस थमा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कोरजा स्कूल में हिंदी पढ़ाने वाला ही नहीं है। सवाल उठता है—जब शिक्षक ही नहीं रहेगा तो पढ़ाई कौन कराएगा? क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है ? जिले में पहले से ही हिंदी व्याख्याताओं की कमी सूत्रों के अनुसार जिले में पहले से ही हिंदी व्याख्याताओं की कमी बनी हुई है। इसके बावजूद व्याख्याता को डाइट में अटैच रखना समझ से परे है। विद्यालय में शिक्षकों की कमी पहले से है, ऐसे में महीनों तक अटैचमेंट जारी रखना छात्रों के साथ अन्याय है।बोर्ड रिजल्ट पहले ही सबसे कमजोर गौरतलब है कि पिछले वर्ष छत्तीसगढ़ में सबसे कम बोर्ड परीक्षा परिणाम जीपीएम जिले का रहा। शिक्षा का स्तर पहले ही चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे में ग्रामीण स्कूलों से विषय विशेषज्ञ हटाना क्या जिले को और पीछे धकेलने की तैयारी है?

FLN की आड़ में मनमानी….?

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डाइट प्राचार्य का कहना है कि FLN (Foundational Literacy and Numeracy) कार्य के लिए जिला शिक्षा अधिकारी के आदेश पर यह अटैचमेंट किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या एफएलएन के नाम पर नियमित विद्यालयों की पढ़ाई ठप कर दी जाएगी ? क्या FLN इतना ही जरूरी है कि बोर्ड कक्षाओं के विद्यार्थियों को बिना शिक्षक के छोड़ दिया जाए ? जवाबदेही तय होगी या नहीं ?

अब सबसे बड़ा सवाल व्यवस्था पर है—
क्या शासन के आदेशों की खुलेआम अवहेलना होती रहेगी ?

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क्या ग्रामीण विद्यालयों को यूँ ही उपेक्षित रखा जाएगा? क्या कोरजा स्कूल के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल पाएगी या वे सिर्फ आंकड़ों का हिस्सा बनकर रह जाएंगे ? यह मामला केवल एक स्कूल का नहीं, बल्कि पूरे जिले की शिक्षा व्यवस्था की हकीकत को उजागर करता है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस पर क्या कार्रवाई करता है,या फिर नियमों की धज्जियां यूँ ही उड़ती रहेंगी।

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