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“1.5 करोड़ की गैस गायब करने का मास्टरमाइंड निकला जिला खाद्य अधिकारी!”

“1.5 करोड़ की गैस गायब करने का मास्टरमाइंड निकला जिला खाद्य अधिकारी….!”

महासमुंद एलपीजी कैप्सूल घोटाले में बड़ा खुलासा, विभागीय सिस्टम को बनाकर ढाल रची गई करोड़ों की साजिश

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महासमुंद। जिले में जब्त एलपीजी कैप्सूल से करीब 1.5 करोड़ रुपये की गैस गबन मामले में अब ऐसा खुलासा हुआ है जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को हिलाकर रख दिया है। अब तक केवल परिवहन और एजेंसी स्तर पर गड़बड़ी की आशंका जताई जा रही थी, लेकिन पुलिस जांच में सामने आया है कि इस पूरे खेल का कथित मुख्य षड्यंत्रकारी स्वयं जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव था।जांच में यह भी सामने आया कि गौरव गैस एजेंसी के संचालक पंकज चंद्राकर और रायपुर निवासी मनीष चौधरी के साथ मिलकर एक सुनियोजित साजिश रची गई थी, जिसके तहत जब्त किए गए एलपीजी कैप्सूल में भरी गैस को अवैध तरीके से निकालकर करोड़ों की उगाही की योजना बनाई गई।

“पहले गैस नापी गई, फिर तय हुआ सौदा”

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सूत्रों के मुताबिक 26 मार्च को खाद्य अधिकारी अजय यादव और पंकज चंद्राकर सिंघोड़ा पहुंचे थे, जहां उन्होंने 6 कैप्सूलों में उपलब्ध गैस का आंकलन किया। जांच में बताया गया कि इन कैप्सूलों में लगभग 102 मीट्रिक टन गैस मौजूद थी। इसी आंकलन के बाद कथित तौर पर एक करोड़ रुपये तक उगाही की योजना तैयार की गई। विभिन्न गैस एजेंसियों से बातचीत के बाद अंततः ठाकुर पेट्रोकेमिकल के साथ 80 लाख रुपये में डील फाइनल हुई।

बताया जा रहा है कि इस सौदे में हिस्सेदारी भी पहले से तय थी, खाद्य अधिकारी अजय यादव को 50 लाख रुपये,पंकज चंद्राकर को 20 लाख रुपये,और मनीष चौधरी को 10 लाख रुपये मिलने थे।“सुपुर्दनामे को बनाया गया घोटाले का हथियार”

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जांच एजेंसियों के अनुसार पूरी साजिश सुपुर्दनामा प्रक्रिया की आड़ में रची गई। आरोप है कि खाद्य अधिकारी ने अपने विभागीय कर्मचारियों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि सुपुर्दनामे के दस्तावेजों में हस्ताक्षर न किए जाएं।

इतना ही नहीं, कैप्सूल का वास्तविक वजन न करने के भी कथित निर्देश दिए गए ताकि बाद में गैस की मात्रा को लेकर भ्रम पैदा किया जा सके। पुलिस कर्मचारियों को भी कथित रूप से गुमराह किया गया। बताया जा रहा है कि सुपुर्दनामा मिलने के बाद मात्र एक सप्ताह के भीतर 6 कैप्सूलों से करीब 92 टन गैस निकाल ली गई। इसके बाद कैप्सूलों का वजन कराया गया, जिससे पूरी प्रक्रिया संदिग्ध हो गई।

“कार्यालय में बैठकर तैयार हुआ फर्जी पंचनामा…!”

जांच में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि वजन और पंचनामा की पूरी प्रक्रिया में आपराधिक कूटरचना की गई। सूत्रों के अनुसार वास्तविक वजन प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही मात्रा का उल्लेख कर पंचनामा तैयार कर लिया गया था और उस पर हस्ताक्षर भी करा लिए गए थे। बाद में यही दस्तावेज कलेक्टोरेट में जमा कर दिए गए आरोप है कि पूरा फर्जी पंचनामा खाद्य अधिकारी के कार्यालय में तैयार किया गया था। इससे यह संदेह और गहरा गया है कि सरकारी दस्तावेजों का उपयोग सुनियोजित आर्थिक अपराध को छिपाने के लिए किया गया।

30 लाख की ‘गिरवी रकम’ ने खोली साजिश की परतें”…..!

पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि अजय यादव के हिस्से के 50 लाख रुपये का तत्काल भुगतान कर दिया गया था। वहीं बकाया 30 लाख रुपये नकद मिलने में देरी होने पर संतोष ठाकुर द्वारा मनीष चौधरी के खाते में 30 लाख रुपये “श्योरिटी” के रूप में डलवाए गए। बाद में नकद भुगतान होने पर यह रकम वापस कर दी गई। इस लेनदेन ने जांच एजेंसियों को आर्थिक साजिश के सीधे प्रमाण उपलब्ध कराए।

100 टन गैस लीकेज संभव ही नहीं”

जांच टीम की तकनीकी रिपोर्ट ने भी पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया। विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा कि सभी कैप्सूल तकनीकी रूप से फिट थे और उनमें लीकेज की संभावना नहीं थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि व्यावहारिक रूप से 100 टन गैस का स्वतः लीकेज होना बिना बड़े विस्फोटों या आगजनी जैसी घटनाओं के संभव नहीं है। यानी “गैस गायब होने” की कहानी तकनीकी परीक्षण में टिक नहीं सकी।

15 दिनों तक चली हाईटेक जांच”

पूरे मामले का खुलासा 40 सदस्यीय विशेष टीम की जांच से हुआ। टीम ने 15 दिनों तक लगातार टेक्निकल एनालिसिस, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) विश्लेषण, साइंटिफिक इंटरोगेशन और दस्तावेजों की सूक्ष्म जांच की।जांच एजेंसियों का दावा है कि डिजिटल साक्ष्य, वित्तीय लेनदेन और आपसी संपर्कों के आधार पर पूरे षड्यंत्र की कड़ियां जोड़ी गईं।

प्रशासनिक गलियारों में मचा हड़कंप

महासमुंद का यह मामला अब केवल गैस गबन तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह सरकारी तंत्र के भीतर भ्रष्टाचार, दस्तावेजी हेरफेर और विभागीय मिलीभगत का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। जिले में इस खुलासे के बाद प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा हुआ है। अब सवाल उठ रहा है कि यदि जांच इतनी गहराई तक नहीं पहुंचती, तो करोड़ों की यह कथित हेराफेरी “लीकेज” के नाम पर हमेशा के लिए दफन हो जाती।

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