जनता परेशान, अफसरों को लूडो खेलने से फुर्सत नहीं! कोरिया के समाधान शिविर में PMGSY अफसरों की शर्मनाक हरकत ने खोली ‘सुशासन’ की पोल”

“जनता परेशान, अफसरों को लूडो खेलने से फुर्सत नहीं! कोरिया के समाधान शिविर में PMGSY अफसरों की शर्मनाक हरकत ने खोली ‘सुशासन’ की पोल”
कैमरा देखते ही डायरी से मोबाइल छिपाने लगे अधिकारी, ग्रामीणों की समस्याओं को छोड़ गेम में व्यस्त रहे जिम्मेदार कर्मचारी

कोरिया/बैकुंठपुर।छत्तीसगढ़ सरकार इन दिनों “सुशासन तिहार” के जरिए गांव-गांव पहुंचकर जनता की समस्याओं का त्वरित समाधान करने और प्रशासन को जवाबदेह बनाने का दावा कर रही है। मुख्यमंत्री से लेकर जिला प्रशासन तक यह संदेश देने में जुटा है कि सरकार आम जनता के दरवाजे तक पहुंच रही है और हर शिकायत का गंभीरता से निराकरण किया जाएगा।
लेकिन कोरिया जिले से सामने आई एक शर्मनाक तस्वीर ने शासन के इस पूरे अभियान की गंभीरता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां जिला स्तरीय समाधान शिविर में जनता की समस्याएं सुनने पहुंचे जिम्मेदार अधिकारी शिकायतों के समाधान में नहीं, बल्कि मोबाइल पर लूडो गेम खेलने में व्यस्त नजर आए। यह घटना जिले के दूरस्थ ग्राम उज्ञाव में आयोजित जिला स्तरीय समाधान शिविर की बताई जा रही है, जहां प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के एसडीओ समेत विभागीय कर्मचारी खुलेआम मोबाइल में गेम खेलते कैमरे में कैद हो गए।

ग्रामीण उम्मीद लेकर पहुंचे, अधिकारी मोबाइल स्क्रीन में उलझे रहे
जानकारी के मुताबिक, बैकुंठपुर जिला मुख्यालय से लगभग 70 किलोमीटर दूर ग्रामीण क्षेत्र में यह समाधान शिविर आयोजित किया गया था। गांवों से बड़ी संख्या में लोग अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे थे। किसी को सड़क की समस्या थी, किसी को निर्माण कार्यों की शिकायत, तो कोई सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलने की बात लेकर शिविर में पहुंचा था।

मंच से जनप्रतिनिधि ग्रामीणों को संबोधित कर रहे थे, प्रशासनिक अधिकारी योजनाओं की जानकारी दे रहे थे और जनता अपनी बारी का इंतजार कर रही थी। लेकिन इसी बीच PMGSY विभाग के जिम्मेदार अधिकारी मोबाइल स्क्रीन पर लूडो की गोटियां चलाने में व्यस्त दिखाई दिए। ग्रामीणों का कहना है कि वे घंटों इंतजार करते रहे, लेकिन जिन अधिकारियों को उनकी समस्याएं सुननी थीं, वे गंभीरता दिखाने के बजाय मोबाइल गेम खेलने में मग्न थे।
कैमरा देखते ही मच गई अफसरों में बेचैनी
मौके पर मौजूद पत्रकारों के कैमरे में जैसे ही यह दृश्य रिकॉर्ड होना शुरू हुआ, वैसे ही संबंधित अधिकारियों के चेहरे के भाव बदल गए। किसी ने तुरंत मोबाइल को डायरी से ढंकने की कोशिश की, तो कोई कैमरे से नजर बचाने लगा। कुछ अधिकारी ऐसे व्यवहार करते नजर आए मानो कुछ हुआ ही न हो। लेकिन कैमरे ने पूरी सच्चाई कैद कर ली। वीडियो और तस्वीरों में साफ दिखाई दिया कि समाधान शिविर जैसे गंभीर आयोजन में अधिकारी जनता की समस्याओं को दरकिनार कर मोबाइल गेम खेलने में व्यस्त थे।
यह घटना सामने आने के बाद प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर सवालों का दौर शुरू हो गया है। लोग पूछ रहे हैं कि जब जिला स्तरीय शिविरों में यह हाल है, तो आम दिनों में कार्यालयों में जनता के साथ कैसा व्यवहार होता होगा?
“सुशासन तिहार” को बना दिया मजाक?
राज्य सरकार का “सुशासन तिहार” सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनता और प्रशासन के बीच भरोसा मजबूत करने का प्रयास माना जा रहा है। मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai खुद भीषण गर्मी में गांव-गांव जाकर योजनाओं का फीडबैक ले रहे हैं, अधिकारियों को संवेदनशील प्रशासन का संदेश दे रहे हैं और आम जनता से सीधे संवाद कर रहे हैं।
लेकिन कोरिया जिले के इस घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जमीनी स्तर पर अधिकारी सरकार की मंशा को गंभीरता से ले भी रहे हैं या नहीं?
जब मुख्यमंत्री जनता के बीच पहुंचकर योजनाओं की हकीकत जानने की कोशिश कर रहे हैं, तब कुछ विभागीय अधिकारी समाधान शिविरों को मनोरंजन का मंच बनाकर शासन की साख पर बट्टा लगाते नजर आ रहे हैं।
ग्रामीणों में भारी नाराजगी, कहा — “समस्या सुनने नहीं, टाइमपास करने आए थे अधिकारी”
घटना के बाद ग्रामीणों में भारी नाराजगी देखी जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि दूर-दराज गांवों से लोग मजदूरी छोड़कर, किराया खर्च कर अपनी समस्याएं लेकर शिविर में पहुंचे थे। उन्हें उम्मीद थी कि प्रशासन उनकी शिकायतें सुनेगा और समाधान निकलेगा।
लेकिन वहां मौजूद कुछ अधिकारियों का रवैया देखकर लोगों का भरोसा टूट गया। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि अधिकारी सिर्फ औपचारिकता निभाने शिविर में पहुंचे थे और जनता की समस्याओं के प्रति बिल्कुल गंभीर नहीं थे।
कुछ ग्रामीणों ने तो यहां तक कहा कि “यदि अधिकारी जनता की परेशानी को इतनी हल्के में लेंगे, तो फिर समाधान शिविर लगाने का औचित्य ही क्या रह जाता है?”
प्रशासन की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
इस पूरे मामले ने प्रशासनिक जिम्मेदारी और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। समाधान शिविर का उद्देश्य जनता की समस्याओं को मौके पर सुनना और उनका निराकरण करना होता है। ऐसे में यदि जिम्मेदार विभागों के अधिकारी ही मोबाइल गेम खेलने में व्यस्त नजर आएं, तो यह न केवल लापरवाही है बल्कि सरकारी कार्यक्रमों की गंभीरता का भी अपमान माना जा रहा है।
राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी इस घटना को लेकर चर्चा तेज हो गई है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी या मामला मीडिया में कुछ दिन चर्चा के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
क्या होगी कार्रवाई या फिर सब कुछ दबा दिया जाएगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिला प्रशासन इस पूरे मामले को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या समाधान शिविर में जनता की समस्याओं का मजाक उड़ाने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होगी? क्या उनसे जवाब तलब किया जाएगा? या फिर हमेशा की तरह यह मामला भी फाइलों और जांचों में दबकर रह जाएगा?
फिलहाल इस घटना ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि सरकार की मंशा चाहे जितनी अच्छी क्यों न हो, यदि जमीनी स्तर पर बैठे जिम्मेदार अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, तो “सुशासन” सिर्फ नारों और पोस्टरों तक सीमित होकर रह जाएगा।














