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छत्तीसगढ़ के विवाह संस्कार में मंगरोहन का क्या योगदान और विशेषता हैं…जानिए।

छत्तीसगढ़: मंगरोहन शव्द का प्रयोग छत्तीसगढ़ी विवाह संस्कार के समय अवश्य ही किया जाता है। यह मंगरोहन न तो कोई देवता है, न ही जादू कि पुड़िया। पर इसके बिना छत्तीसगढ़ में विवाह संस्कार सम्पन्न ही नहीं होता। मंगरोहन कि स्थापना के अवसर पर गाए जाने वाले गीत मंगरोहन गीत के नाम से विख्यात है। इन गीतों को सुनते ही – वे सब लोग, जो कन्या की माँ बनने का वरदान लेकर आई हैं, दर्द, टीस बिछोह के दुःख व बेटी के पराए हो जाने की पीड़ा से भर जाती है। छत्तीसगढ़ की आंचलिक संस्कृति में “मंगरोहन” विवाह गीतों का गहरा आधार बनता है।छत्तीसगढ़ की आंचलिक संस्कृति में यहां के रीति-रिवाजों, लोक गीतों उत्सवों का विशेष महत्व है। मूल छत्तीसगढ़ संस्कृति में विवाह संस्कार एक मोहक उत्सव है, जिसमें बेटी की विदाई की पीड़ा है, तो वर यात्रा की मोहक अदाकारी भी। बारात प्रस्थान के बाद एक रात का स्त्री राज्य होता है, जहां स्त्रियां पुरुषों का स्वांग करती हैं, सारी रात जगती हैं, नाचती-गाती हैं और फिर दूसरे दिन सप्तपदी। सात भंवरों के साथ सात वचन लेना और देना। बारात प्रस्थान से पूर्व मातृका पूजन में समस्त पितरों का आह्वान और उससे भी पूर्व मण्डपाच्छादन में “मंगरोहन” की स्थापना।

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