
सेवा’ के नाम पर शिक्षकों से 200 रुपये की वसूली? शिक्षा रथ अभियान पर उठे गंभीर सवाल
DEO बोले—ऐसी कोई अनिवार्य राशि लेने का आदेश नहीं, फिर किसके निर्देश पर शिक्षकों से मांगे गए ₹200?

कोरबा/पोड़ी-उपरोड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में 17 सितंबर से शुरू ‘सेवा संकल्प अभियान’ के तहत जरूरतमंद बच्चों तक शैक्षणिक सामग्री पहुंचाने के उद्देश्य से शिक्षा रथ निकाला गया। जिला स्तर पर अभियान में नागरिकों से स्वैच्छिक रूप से पुस्तक, कॉपी, पेन और अन्य शैक्षणिक सामग्री दान करने की अपील की गई है।
लेकिन पोड़ी-उपरोड़ा विकासखंड में इसी अभियान को लेकर शिक्षकों से 200 रुपये लेने का मामला सामने आने का दावा किया जा रहा है, जिससे शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।

व्हाट्सएप मैसेज बना सवालों का आधार
सिंघिया संकुल से जुड़े शिक्षकों के व्हाट्सएप ग्रुप में प्रसारित एक मैसेज में कथित तौर पर प्रत्येक शिक्षक से 200 रुपये सहयोग राशि देने और संस्था प्रमुखों द्वारा अपने तथा अधीनस्थ शिक्षकों की राशि बैठक में लेकर आने की बात लिखी गई।

वहीं एक अन्य कथित पोस्टर में “कलेक्टर सर एवं डीईओ सर के स्पष्ट निर्देशों के अनुपालन में” शिक्षकों से शिक्षा रथ संचालन के लिए 200 रुपये आर्थिक योगदान देने की बात लिखे जाने का दावा है।
यदि ये संदेश वास्तविक और प्रमाणित पाए जाते हैं, तो सवाल सीधा है—जब राशि स्वैच्छिक थी, तो “अवश्य दें” और “राशि लेते आएंगे” जैसी भाषा क्यों इस्तेमाल की गई?
DEO का बयान मामले को और गंभीर बनाता है
इस पूरे विवाद के बीच जिला शिक्षा अधिकारी की ओर से स्पष्ट किया गया है कि शिक्षा दान रथ अथवा ‘सेवा मेरा योगदान’ कार्यक्रम के लिए शिक्षकों से 200 रुपये या किसी भी प्रकार की अनिवार्य सहयोग राशि लेने का कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। पाली विकासखंड में इसी तरह की सूचना प्रसारित करने वाले एक संकुल शैक्षिक समन्वयक को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
अब पोड़ी-उपरोड़ा में सामने आए कथित मैसेज ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।
1500 शिक्षक × ₹200 = ₹3 लाख!
सूत्रों के अनुसार पोड़ी-उपरोड़ा बीईओ कार्यालय के अंतर्गत बड़ी संख्या में संकुल और करीब 1500 शिक्षक पदस्थ हैं। यदि प्रत्येक शिक्षक से वास्तव में 200 रुपये लिए गए हैं, तो राशि लगभग 3 लाख रुपये तक पहुंच सकती है।
हालांकि, यह राशि वास्तव में कितनी एकत्र हुई, किसने एकत्र की, किस खाते में जमा हुई और उसका उपयोग कहां किया गया—इन तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि और दस्तावेजी जांच आवश्यक है।
पुस्तक दान से कॉपी, बोतल और टिफिन तक कैसे पहुंचा अभियान?
शिक्षा रथ का घोषित उद्देश्य जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए शैक्षणिक सामग्री जुटाना है। कोरबा में सार्वजनिक जानकारी के अनुसार नागरिकों से स्वेच्छा से कॉपी, पुस्तक, पेन और अन्य अध्ययन सामग्री देने की अपील की गई है।
ऐसे में यदि शिक्षकों से निश्चित 200 रुपये लिए गए हैं, तो यह जांच का विषय है कि इसकी अनुमति किसने दी और एकत्र राशि से खरीदी गई सामग्री का बिल, भुगतान और वितरण रिकॉर्ड क्या है?
सबसे बड़ा सवाल—किसके नाम पर हुई वसूली?
जब जिला शिक्षा अधिकारी स्वयं ऐसी अनिवार्य राशि लेने के किसी आदेश से इनकार कर चुके हैं, तब पोड़ी-उपरोड़ा में कथित तौर पर कलेक्टर और डीईओ के नाम का हवाला देकर राशि मांगने की जांच जरूरी हो जाती है।
क्या किसी ने मौखिक निर्देश का हवाला दिया?
क्या शिक्षकों से वास्तव में राशि ली गई?
कितने शिक्षकों से कितनी रकम जुटाई गई?
राशि किसके पास जमा हुई?
कहां खर्च हुई?
क्या शिक्षकों की रकम वापस होगी?
इन सवालों का जवाब अब शिक्षा विभाग और प्रशासन को देना होगा।
‘स्वैच्छिक दान’ या दबाव में लिया गया योगदान?
जरूरतमंद बच्चों के लिए सहयोग जुटाना निश्चित रूप से जनभागीदारी का विषय है, लेकिन यदि किसी कर्मचारी से योगदान स्वैच्छिक के बजाय अनिवार्य तरीके से लिया गया है, तो यह प्रशासनिक जांच का गंभीर विषय बनता है। अब निगाहें कलेक्टर कोरबा पर हैं कि वे पोड़ी-उपरोड़ा में सामने आए कथित 200 रुपये वसूली प्रकरण का स्वतः संज्ञान लेकर व्हाट्सएप संदेश, भुगतान रिकॉर्ड, शिक्षकों के बयान, संकुल स्तर के निर्देश और राशि के हिसाब-किताब की निष्पक्ष जांच कराते हैं या नहीं।
सेवा के नाम पर चल रहे अभियान में यदि कहीं दबाव या अनधिकृत वसूली हुई है, तो जिम्मेदारी तय होना जरूरी है—क्योंकि ‘सेवा’ स्वेच्छा से होती है, दबाव से नहीं।















