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सरकारी आदेशों को खुली चुनौती? प्रांताध्यक्ष विकास कुमार यादव पर आचरण नियम तोड़ने के गंभीर आरोप!

सरकारी आदेशों को खुली चुनौती ? प्रांताध्यक्ष विकास कुमार यादव पर आचरण नियम तोड़ने के गंभीर आरोप !

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पाली के लैब टेक्नीशियन बिलासपुर और संयुक्त स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष विकास कुमार यादव पर आरोप है कि उन्होंने शासन के स्पष्ट आदेशों की न सिर्फ अवहेलना की, बल्कि खुले तौर पर विरोध की रणनीति भी बनाई।

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शासन का आदेश 

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सूत्रों के मुताबिक, राज्य शासन ने लैब, सीटी स्कैन और एक्स-रे सेवाओं के संचालन का जिम्मा एचएलएल के माध्यम से कराने का निर्णय लिया था। यह एक नीतिगत फैसला था, जिसका पालन सभी संबंधित कर्मचारियों के लिए अनिवार्य है। लेकिन आरोप है कि विकास यादव ने इस निर्णय के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए अपने संघ से जुड़े कर्मचारियों को नेता प्रतिपक्ष से संपर्क कर विरोध दर्ज कराने के लिए प्रेरित किया।

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विरोध पत्राचार, जबकि शासन से पत्राचार करने की अनुमति नहीं…!

प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि यदि कोई शासकीय कर्मचारी सीधे तौर पर राजनीतिक हस्तक्षेप की कोशिश करता है, तो यह छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण अधिनियम, 2006 का गंभीर उल्लंघन माना जाता है। सरकारी कर्मचारी किसी राजनीतिक दल या नेता से मिलकर शासन के निर्णयों का विरोध नहीं कर सकते। विरोध दर्ज कराने के लिए वैधानिक प्रक्रियाएं मौजूद हैं—ज्ञापन, संघीय प्रतिनिधित्व या वैधानिक आंदोलन—लेकिन सीधे राजनीतिक मंच का सहारा लेना नियमों के खिलाफ है।

मामला यहीं नहीं थमता। आरोप यह भी है कि सूचना के अधिकार (RTI) का बार-बार इस्तेमाल कर प्रशासनिक कामकाज में अनावश्यक बाधा डाली गई। साथ ही, शासकीय दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही बरतने से विभागीय कार्य भी प्रभावित हुए।

इस पूरे घटनाक्रम पर जब विकास कुमार यादव से प्रतिक्रिया ली गई, तो उन्होंने कहा—

“हमने कर्मचारियों के हित में पत्राचार किया है। शासन से पत्राचार करने की अनुमति मांगी गई है, प्रक्रिया जारी है।”

लेकिन सबसे बड़ा और तीखा सवाल यही उठ रहा है—!

जब संगठन को पत्राचार की अनुमति ही नहीं मिली, तो फिर शासन के आदेश के विरोध में पहले ही पत्राचार क्यों किया गया?

क्या यह खुली अवज्ञा नहीं है ?

स्वास्थ्य विभाग के भीतर चर्चा है कि यदि ऐसे मामलों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होती, तो अनुशासन व्यवस्था पर सवाल खड़े होंगे। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो निलंबन, कारण बताओ नोटिस या अन्य सख्त विभागीय कार्रवाई संभव है।

अब निगाहें शासन पर टिकी हैं—!

क्या नियमों की धज्जियां उड़ाने के इस कथित मामले में कठोर कदम उठाया जाएगा, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

यह प्रकरण सिर्फ एक कर्मचारी का नहीं, बल्कि पूरे विभागीय अनुशासन और शासन की साख का सवाल बन चुका है।

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