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विपणन विभाग की घोर लापरवाही उजागर, 20 हजार क्विंटल धान सड़ा, शासन को 6 करोड़ से अधिक का नुकसान

विपणन विभाग की घोर लापरवाही उजागर, 20 हजार क्विंटल धान सड़ा, शासन को 6 करोड़ से अधिक का नुकसान !

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही।छत्तीसगढ़ के गौरेला–पेंड्रा–मरवाही जिले में विपणन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यहां विगत खरीफ विपणन वर्ष 2024–25 में समर्थन मूल्य पर खरीदा गया लगभग 20,000 क्विंटल धान सड़कर बर्बाद हो गया, जिससे शासन को 6 करोड़ रुपये से अधिक का सीधा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक बड़े भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता प्रतीत हो रहा है।

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वीरेन्द्र सिंह बघेल, कांग्रेस प्रवक्ता, जिला गौरेला पेंड्रा मरवाही।

मामले के सामने आते ही विभाग में हड़कंप मचा हुआ है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिम्मेदार अधिकारी जवाबदेही लेने के बजाय सफाई देने में जुटे हैं।

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योगेन्द्र सिंह नहरेल, BJP किसान मोर्चा अध्यक्ष, गौरेला पेंड्रा मरवाही।

सवाल यह नहीं है कि धान खराब हुआ या नहीं, सवाल यह है कि इतनी बड़ी मात्रा में धान आखिर किसकी मिलीभगत से सड़ने दिया गया? खुले आसमान के नीचे “सरकारी धन” की बर्बादी सूत्रों के अनुसार, समर्थन मूल्य पर किसानों से खरीदा गया यह धान संग्रहण केंद्रों में महीनों तक पड़ा रहा। समय पर न तो इसका उठाव कराया गया, न ही कस्टम मिलिंग के लिए राइस मिलों को भेजा गया। कई केंद्रों पर धान को खुले मैदान में, बिना पॉलिथीन कवर और वैज्ञानिक भंडारण व्यवस्था के रखा गया।नतीजा यह हुआ कि बारिश, नमी और मौसम के प्रभाव से धान पूरी तरह काला पड़ गया, दाने सड़ गए और उसकी गुणवत्ता इतनी गिर गई कि वह खपत के लायक भी नहीं बचा।
किसानों की मेहनत पर पानी, सिस्टम चैन की नींद में यह वही धान है, जिसे उगाने के लिए किसान ने महीनों मेहनत की, कर्ज लिया, खेतों में पसीना बहाया। लेकिन सरकारी सिस्टम की लापरवाही ने किसानों की मेहनत को कूड़े में तब्दील कर दिया।किसान संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते परिवहन, तिरपाल-पॉलिथीन कवरिंग और मिलिंग की व्यवस्था कर दी जाती, तो यह नुकसान रोका जा सकता था। सवाल यह भी है कि जब विभाग के पास पूरे स्टाफ, गोदाम और बजट मौजूद था, तो फिर धान को भगवान भरोसे क्यों छोड़ दिया गया?

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अधिकारी की सफाई,सवाल बरकरार
जिला विपणन अधिकारी हरीश शर्मा का कहना है !

कि कुल 20 हजार क्विंटल में से करीब 16 हजार क्विंटल धान का डिलीवरी ऑर्डर (DO) कट चुका है और राइस मिलर्स इसे उठाने के लिए तैयार हैं।लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब धान पहले ही अमानक हो चुका है,जब वह काला पड़ चुका है,
जब उसकी गुणवत्ता समाप्त हो चुकी है,तो फिर DO काटने का क्या औचित्य रह जाता है? क्या यह नुकसान छिपाने की कोशिश है?

क्या DO काटकर जिम्मेदारी से बचने का रास्ता तलाशा जा रहा है?

क्या यह सिर्फ लापरवाही है या बड़ा खेल? यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी छत्तीसगढ़ के कई जिलों में धान खराब होने, गायब होने या घटिया भंडारण के मामले सामने आ चुके हैं। हर बार जांच के नाम पर खानापूर्ति होती है और कुछ समय बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
अब सवाल उठ रहा है—क्या धान खराब होने के पीछे सिर्फ लापरवाही है, या जानबूझकर करोड़ों का नुकसान पहुंचाने का खेल?
क्या इसमें ठेकेदार, मिलर्स और विभागीय अधिकारियों की सांठगांठ है?
उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज किसान संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जानकारों ने इस मामले में उच्चस्तरीय और स्वतंत्र जांच,
जिम्मेदार अधिकारियों पर आपराधिक कार्रवाई,और नुकसान की भरपाई दोषियों से कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि इस मामले में सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो भविष्य में भी इसी तरह किसानों की उपज और सरकारी धन को लापरवाही और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाया जाता रहेगा।
अब देखना यह है कि शासन इस गंभीर मामले को सिर्फ फाइलों में दबाता है, या फिर वास्तव में दोषियों पर कार्रवाई कर किसानों और जनता के हितों की रक्षा करता है।क्योंकि यह मामला सिर्फ धान का नहीं, बल्कि सिस्टम की सड़ांध का है।

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