LIVE UPDATE
झमाझम खबरेंट्रेंडिंगप्रदेशराजनीतीरायपुर

**“नेताओं की मर्जी से चलता वन विभाग?” कानून फाइलों में बंद, जंगल माफियाओं के हवाले** 09 जून के ‘अंतिम नोटिस’ के बाद भी 6 महीने चुप रहीं DFO — उदासीनता या राजनीतिक दबाव?

मरवाही (जिला गौरेला–पेंड्रा–मरवाही)।मरवाही वनमंडल अंतर्गत ग्राम दानीकुंडी की संरक्षित वन नारंगी भूमि पर अवैध कब्जे का मामला अब केवल वन विभाग की नाकामी नहीं, बल्कि उसकी मूक सहमति का स्पष्ट प्रतीक बन चुका है। जिस ज़मीन की रक्षा के लिए पूरा वन तंत्र खड़ा किया गया है, वही ज़मीन आज माफियाओं के कब्जे में है और विभाग खामोशी ओढ़े बैठा है।

वन विभाग द्वारा 09 जून 2025 को अतिक्रमणकारियों को “अंतिम नोटिस” जारी किया गया था, जिसमें स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि 15 दिनों के भीतर अवैध कब्जा हटाया जाए, अन्यथा बलपूर्वक बेदखली और कानूनी कार्रवाई की जाएगी। लेकिन आज तारीख़ 20 दिसंबर 2025 है। यानी 15 दिन नहीं, पूरे छह महीने बीत चुके हैं। इस दौरान बरसात आई, खत्म हुई, ठंड का मौसम भी आ गया, लेकिन ज़मीन पर एक भी अतिक्रमण नहीं हटा।

ये खबर भी पढ़ें…
बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़? 20-25 KM दूर के शिक्षकों को थमाई हॉस्टल की जिम्मेदारी, !
बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़? 20-25 KM दूर के शिक्षकों को थमाई हॉस्टल की जिम्मेदारी, !
August 8, 2026
गौरेला पेंड्रा मरवाही - बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़? 20-25 KM दूर के शिक्षकों को थमाई हॉस्टल की जिम्मेदारी..! गौरेला।...
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

नोटिस के बाद जब विभाग पर सवाल उठे, तो वनमंडलाधिकारी (DFO) की ओर से यह बयान सामने आया कि “कार्रवाई बारिश के बाद की जाएगी और यह निर्णय जनप्रतिनिधियों से चर्चा के बाद लिया गया है।” यही बयान इस पूरे मामले को और गंभीर बना देता है। क्योंकि अब सवाल यह नहीं रह जाता कि कार्रवाई क्यों नहीं हुई, बल्कि यह बन जाता है कि कार्रवाई किस बारिश का इंतज़ार कर रही है। बरसात कब की समाप्त हो चुकी है, नदियाँ उतर चुकी हैं, खेत सूख चुके हैं, फिर भी कार्रवाई ज़मीन पर कहीं दिखाई नहीं देती। इससे यह आशंका गहराती है कि “बारिश के बाद” कोई मौसम नहीं, बल्कि एक स्थायी बहाना बन चुका है।

इन छह महीनों के दौरान जंगल नहीं रुका। अवैध पक्के मकानों का निर्माण लगातार जारी रहा। पेड़ों की गर्डलिंग की गई, कई स्थानों पर पेड़ों की कटाई हुई। सरकारी फेंसिंग को तोड़कर उसी तार से कब्जों की घेराबंदी की गई। जलनिकासी के लिए बनाई गई संरचनाओं तक पर कब्जा कर लिया गया। दूसरी ओर DFO का कार्यालय पूरी तरह शांत रहा। न कोई एफआईआर दर्ज की गई, न कोई ध्वस्तीकरण हुआ, न ही किसी तरह की बेदखली की कार्रवाई दिखाई दी।

ये खबर भी पढ़ें…
हर घर तिरंगा अभियान के तहत जिले में 9 से 17 अगस्त तक होंगे विविध आयोजन
हर घर तिरंगा अभियान के तहत जिले में 9 से 17 अगस्त तक होंगे विविध आयोजन
August 8, 2026
हर घर तिरंगा अभियान के तहत जिले में 9 से 17 अगस्त तक होंगे विविध आयोजन 14 अगस्त को विभाजन...
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 80(ए), 29, 32 और 33 साफ तौर पर कहती हैं कि वन भूमि पर कब्जा करना, निर्माण करना और पेड़ काटना गंभीर आपराधिक अपराध है। इसमें तीन वर्ष तक की सजा, जुर्माना और अवैध निर्माण के तत्काल ध्वस्तीकरण का प्रावधान है। कानून स्पष्ट है, अपराध सामने है, फिर भी न कानून चलता दिख रहा है, न अधिकारी, और न ही सरकार की कोई ठोस मौजूदगी।

DFO द्वारा “जनप्रतिनिधियों से चर्चा” का तर्क इस पूरे मामले को राजनीतिक रंग दे देता है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या वन विभाग स्वतंत्र होकर कानून लागू करने में असमर्थ हो चुका है। क्या अब वन अपराधों पर कार्रवाई के लिए राजनीतिक अनुमति अनिवार्य हो गई है। और क्या यह देरी अतिक्रमणकारियों को और मजबूत करने की एक सोची-समझी रणनीति है।

ये खबर भी पढ़ें…
फर्जी डिग्री के सहारे झोलाछाप इलाज? नोटिस और शपथपत्र के बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों में प्रैक्टिस जारी होने का आरोप
फर्जी डिग्री के सहारे झोलाछाप इलाज? नोटिस और शपथपत्र के बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों में प्रैक्टिस जारी होने का आरोप
August 8, 2026
फर्जी डिग्री के सहारे झोलाछाप इलाज? नोटिस और शपथपत्र के बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों में प्रैक्टिस जारी होने का आरोप...
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

09 जून को अंतिम नोटिस जारी हुआ। 24 जून को उसकी 15 दिन की समयसीमा समाप्त हो गई। जुलाई और अगस्त में बारिश का बहाना सामने आया। सितंबर और अक्टूबर में कोई हलचल नहीं दिखी। नवंबर और दिसंबर तक पूरा प्रशासनिक सन्नाटा छाया रहा। कैलेंडर बदल गया, मौसम बदल गया, लेकिन DFO का रुख नहीं बदला।

स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सीधा आरोप है कि यह मामला साधारण लापरवाही का नहीं है, बल्कि राजनीतिक प्रभाव के आगे समर्पण का है। उनका कहना है कि यदि DFO चाहतीं, तो 15 दिनों के भीतर कार्रवाई संभव थी। लेकिन जब एक अधिकारी नोटिस देता है, अपराध को स्वीकार करता है, कानून और सबूतों से अवगत होता है और फिर छह महीने तक हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है, तो यह मानना स्वाभाविक हो जाता है कि कार्रवाई करने में उसे “तकलीफ” हो रही है, और यह तकलीफ राजनीतिक दबाव से पैदा हुई है।

अब सवाल यह नहीं रह गया है कि कार्रवाई कब होगी। असली सवाल यह है कि क्या कार्रवाई होगी भी या नहीं। क्या जंगल अब सिर्फ कागज़ों में सुरक्षित रह गए हैं। और क्या इस पूरे अतिक्रमण के लिए DFO केवल नैतिक रूप से ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक रूप से भी जिम्मेदार हैं। यदि अब भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो यह तय मान लिया जाएगा कि दानीकुंडी का जंगल सिर्फ माफियाओं ने नहीं, बल्कि वन विभाग की चुप्पी ने भी उजाड़ा है।

Back to top button
error: Content is protected !!