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जीपीएम जिले के भांडी हाई स्कूल के आदिवासी छात्रा की पीड़ा ने खोली सिस्टम की परतें, प्राचार्य अपनी जिम्मेदारी से कोसों दूर…! शिक्षा विभाग बना चर्चा का विषय?

“तीन बहनें, पिता विहीन और टूटा भरोसा — घायल आदिवासी छात्रा की कहानी सिस्टम पर तमाचा”

(गौरेला–पेंड्रा–मरवाही)।विकासखंड पेंड्रा अंतर्गत शासकीय हाई स्कूल भांडी में कक्षा 9वीं की आदिवासी छात्रा संतोषी, पिता हुबलाल, के साथ हुआ गंभीर हादसा अब शिक्षा विभाग की संवेदनहीनता और प्रशासनिक लापरवाही का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है। यह मामला केवल एक दुर्घटना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इलाज में देरी, छात्रा की असहजता और जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुरुवार 15 जनवरी 2026 को स्कूल समय के दौरान छात्रा स्कूल भवन की छत से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गई। परिजनों का आरोप है कि दुर्घटना के तुरंत बाद छात्रा को समुचित और तत्काल चिकित्सकीय उपचार नहीं दिलाया गया। गंभीर चोट लगने के बावजूद स्कूल प्रबंधन और प्राचार्य कांति टोप्पो द्वारा मामले को हल्के में लिया गया, जिससे छात्रा को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया गया।

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दो दिन बाद एक्स-रे, फिर भी इलाज अधूरा ?

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घटना के लगभग दो दिन बाद छात्रा को जिला अस्पताल ले जाकर एक्स-रे कराया गया, जिसमें घुटने के नीचे की हड्डी में फ्रैक्चर होने की पुष्टि हुई। इसके बावजूद न तो छात्रा के पैर में प्लास्टर चढ़ाया गया और न ही उसे कोई आवश्यक दवा उपलब्ध कराई गई। परिजनों का यह भी आरोप है कि आज तक उन्हें एक्स-रे रिपोर्ट की हार्ड कॉपी नहीं दी गई, जबकि बताया जा रहा है कि रिपोर्ट केवल प्राचार्य के मोबाइल फोन में मौजूद है।

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छात्रा की आपत्ति के बावजूद वही शिक्षक साथ भेजे गए इलाज के नाम पर छात्रा को रतन सिंह पैकरा (व्याख्याता) और कुशल सिंह पैकरा (व्याख्याता, गणित) के साथ अस्पताल ले जाया गया। इस दौरान छात्रा ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह इन शिक्षकों के साथ नहीं जाना चाहती। इसके बावजूद बार-बार उन्हें ही साथ भेजा गया।

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है ?

कि जब विद्यालय में महिला शिक्षिकाएं मौजूद हैं, तब एक घायल छात्रा को पुरुष शिक्षकों के साथ भेजना आखिर किस नियम और संवेदनशीलता के तहत किया गया? यह निर्णय प्राचार्य की भूमिका और सोच पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

आदिवासी, पिता-विहीन परिवार की पीड़ा अनसुनी

छात्रा एक आदिवासी परिवार से है। उसके परिवार में तीन बहनें और मां हैं, जबकि पिता का पहले ही देहांत हो चुका है। ऐसे में इस परिवार के लिए यह घटना और भी पीड़ादायक है। आरोप है कि इस संवेदनशील पारिवारिक स्थिति के बावजूद प्राचार्य अपनी जवाबदेही से लगातार बचते नजर आ रहे हैं।

समाचार के बाद दिखावटी सक्रियता !

स्थानीय लोगों का कहना है कि जैसे ही मामला सार्वजनिक हुआ और समाचार प्रकाशित हुए, उसके बाद आनन-फानन में दिखावे के तौर पर फिर से शिक्षक छात्रा को अस्पताल ले गए। लेकिन इस दौरे का भी कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। न तो प्लास्टर कराया गया और न ही कोई प्रभावी इलाज सुनिश्चित किया गया।

जिला शिक्षा अधिकारी पर भी सवाल !

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पूरे मामले की जानकारी होने के बावजूद जिला शिक्षा अधिकारी भी अपनी स्पष्ट जवाबदेही से बचते नजर आ रहे हैं। न तो अब तक किसी ठोस कार्रवाई की घोषणा की गई है और न ही यह स्पष्ट किया गया है कि इलाज में हुई देरी और छात्रा की असुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है। इससे यह संदेश जा रहा है कि शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारी भी मामले को गंभीरता से लेने के बजाय औपचारिकता निभा रहे हैं।

अन्य व्यवसाय में व्यस्त शिक्षक, स्कूल में रुचि पर प्रश्न

मिली जानकारी के अनुसार व्याख्याता रतन सिंह पैकरा हर्बल लाइफ के व्यवसाय से भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि जब शिक्षक निजी व्यवसाय में व्यस्त हैं, तो विद्यालय और विद्यार्थियों की सुरक्षा व देखरेख में उनकी प्राथमिकता कितनी है।

ग्रामीणों में आक्रोश, निष्पक्ष जांच की मांग

घटना के बाद स्थानीय ग्रामीणों और अभिभावकों में भारी नाराजगी है। लोगों का कहना है कि यह केवल एक छात्रा का मामला नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों में सुरक्षा, संवेदनशीलता और जवाबदेही की गंभीर परीक्षा है। ग्रामीणों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर लापरवाही बरतने वाले प्राचार्य, संबंधित शिक्षकों और जिला स्तर के जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी छात्रा के साथ इस तरह की घटना दोबारा न हो।

यह मामला अब शिक्षा व्यवस्था में मानवता और जवाबदेही की कसौटी बन चुका है। अब देखना यह है कि प्रशासन केवल चुप्पी साधे रहता है या वास्तव में दोषियों पर ठोस कार्रवाई करता है।

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