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लापरवाही या आदेश को चुनौती_? मरवाही बीएमओ डॉ. हर्षवर्धन और सीएमएचओ रामेश्वर शर्मा की भूमिका पर गहराया विवाद___

लापरवाही या आदेश को चुनौती_? मरवाही बीएमओ डॉ. हर्षवर्धन और सीएमएचओ रामेश्वर शर्मा की भूमिका पर गहराया विवाद___

दीपक गुप्ता: गौरेला-पेंड्रा-मरवाही-_स्वास्थ्य विभाग की स्थानांतरण नीति पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। ग्रामीण चिकित्सा अधिकारी इम्तियाज मंसूरी के मामले ने न केवल अधिकारियों की कार्यशैली बल्कि शासन के आदेशों की गंभीर अनदेखी को उजागर कर दिया है_क्या है पूरा मामला_इम्तियाज मंसूरी पहले सिवनी (मरवाही ब्लॉक) में पदस्थ थे_25 जून 2025 को उनका जिला स्तर पर स्थानांतरण आदेश जारी हुआ_मात्र एक दिन बाद 26 जून 2025 को स्वास्थ्य विभाग द्वारा उनका प्रशासनिक स्थानांतरण आदेश जारी करते हुए उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सोनक्यारी, जिला जशपुर पदस्थ किया गया।

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शासन का आदेश स्पष्ट होने के बावजूद मरवाही बीएमओ डॉ. हर्षवर्धन मेहर ने उन्हें कार्यमुक्त नहीं किया।बीएमओ का तर्क और सवाल_बीएमओ का कहना है कि “डॉक्टर की कमी” के चलते वे रिलीव नहीं कर सकते। लेकिन सवाल यह उठता है कि—जब डॉक्टरों की पहले से ही कमी थी, तो फिर जिला स्तर पर स्थानांतरण आदेश क्यों जारी किया गया_ग्रामीण चिकित्सा अधिकारी (RMA) का पद राज्य स्तरीय माना जाता है, तो फिर जिला स्तर पर स्थानांतरण कैसे कर दिया गया…? शासन का स्पष्ट प्रशासनिक आदेश होने के बाद भी एक बीएमओ को उसे रोकने या टालने का अधिकार कैसे मिल गया….? पहले भी हुआ था विवाद_इससे पहले भी अनवर खान का स्थानांतरण स्वयं के व्यय पर किया गया था, लेकिन तब भी कार्यमुक्त नहीं किया गया। इस तरह के दोहराए जाने वाले मामले विभाग की स्थानांतरण प्रक्रिया में भारी अनियमितताओं और मनमानी को उजागर करते हैं।बड़ा सवाल_विशेषज्ञों का कहना है कि यह पूरा घटनाक्रम स्पष्ट रूप से छत्तीसगढ़ शासन स्वास्थ्य एवं लोक कल्याण विभाग के आदेशों की धज्जियाँ उड़ाने जैसा है।ऐसे मामलों से न केवल स्थानांतरण नीति की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है, बल्कि कर्मचारियों में असमंजस और स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ रहा है।

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सीएमएचओ की भूमिका पर भी सवाल__

इस मामले में केवल बीएमओ ही नहीं, बल्कि सीएमएचओ डॉ. रामेश्वर शर्मा की चुप्पी भी चर्चा में है।जिले में स्वास्थ्य विभाग के सर्वोच्च अधिकारी होने के नाते आदेश पालन सुनिश्चित कराना उनकी जिम्मेदारी है। सीएमएचओ चाहें तो बीएमओ को स्पष्ट निर्देश देकर कार्यमुक्ति की प्रक्रिया पूरी करा सकते थे।लेकिन अब तक उनके स्तर से भी कोई ठोस पहल नहीं हुई है। बड़ा सवाल_क्या बीएमओ और सीएमएचओ मिलकर शासन के आदेशों को दरकिनार कर सकते हैं_क्या डॉक्टरों की कमी का बहाना बनाकर आदेशों को रोकना उचित है____?और यदि आदेशों का पालन ही न हो तो स्थानांतरण नीति का औचित्य क्या रह जाएगा_डॉ. इम्तियाज मंसूरी का मामला यह साफ कर देता है कि स्वास्थ्य विभाग में स्थानांतरण नीति गंभीर संकट में है। _बीएमओ और सीएमएचओ_ की लापरवाही ने आदेश अनुपालन की वास्तविकता उजागर कर दी है। शासन को चाहिए कि ऐसे मामलों की उच्च स्तरीय जाँच कर सख्त कार्रवाई करे, ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी शासन के आदेशों को दरकिनार करने की हिम्मत न जुटा सके।

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