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_Forest department“राकेश राठौर का विभाग से कैसा गठजोड़….? जहाँ से हुए निलंबित, वहीं मिली बहाली….!”

_Forest department“राकेश राठौर का विभाग से कैसा गठजोड़….? जहाँ से हुए निलंबित, वहीं मिली बहाली….!”

रायपुर_गौरेला–पेंड्रा–मरवाही।मरवाही वनमंडल के साधवानी परिसर में ग्रीन क्रेडिट योजना के तहत किए गए पौधारोपण, बीज रोपण और पौधों के संरक्षण कार्यों में हुई भारी लापरवाही और अनियमितताओं के बाद विभाग ने नर्सरी प्रभारी उदय तिवारी और नर्सरी सहायक एवं परिसर रक्षक राकेश राठौर को निलंबित किया था। दोनों को तत्काल प्रभाव से रायगढ़ वनमंडल अटैच किया गया था, परंतु हैरानी की बात यह रही कि सीसीएफ कार्यालय द्वारा आदेश निरस्त कर कार्रवाई की जिम्मेदारी डीएफओ मरवाही को सौंप दी गई।

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सूत्रों के अनुसार, डीएफओ मरवाही द्वारा निलंबन आदेश कागजों तक सीमित रहा, क्योंकि राकेश राठौर निलंबन अवधि में भी साधवानी परिसर में ही कार्यरत रहा। और हैरान करने वाली बात तो तब सामने आई जब डीएफओ मरवाही ने स्वयं उसे उसी साधवानी केंद्रीय नर्सरी में नर्सरी प्रभारी के रूप में पुनः बहाल कर दिया।

जब पत्रकारों ने इस पर सवाल उठाए,

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तो “डीएफओ ग्रीष्मी चांद” ने गुमराह करते हुए बयान दिया कि “नर्सरी और परिसर अलग-अलग हैं”, जबकि विभागीय रिकार्ड और स्थानीय स्थिति इसके विपरीत है। परिसर रक्षक और नर्सरी प्रभारी दोनों का कार्यस्थल एक ही परिसर में है।

डीएफओ ने विभागीय नियमों की खुली अवहेलना !

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वन विभाग के सेवा नियमों के अनुसार, “किसी कर्मचारी को निलंबन अवधि समाप्त होने के बाद भी उसी कार्यस्थल पर पुनः पदस्थ नहीं किया जा सकता, जहाँ से उस पर लापरवाही या अनियमितता का आरोप सिद्ध हुआ हो।”

ऐसे में राकेश राठौर की साधवानी परिसर में बहाली को पूरी तरह नियमविरुद्ध माना जा रहा है। यह न केवल विभागीय अनुशासन पर सवाल खड़े करता है, बल्कि अधिकारियों की कार्यशैली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

क्या कहते हैं , विभाग के कर्मचारी

“मैदानी कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की जाती है, लेकिन जब बात बाबुओं या शाखा प्रभारियों की आती है तो फाइलें ठंडी पड़ जाती हैं। अधिकांश स्वीकृत कार्यों की सामग्री खरीदी में गड़बड़ियाँ ऊपर तक जाती हैं। अगर निष्पक्ष जांच हो तो करोड़ों के घोटाले सामने आ सकते हैं।”उच्च अधिकारियों के स्तर पर इस तरह की नियमविरुद्ध बहालियों और ढिलाईपूर्ण निर्णयों से अनुशासनहीनता को बढ़ावा मिल रहा है। ईमानदार कर्मचारियों का मनोबल गिर रहा है, जबकि लापरवाह कर्मचारी बेखौफ हो गए हैं।मरवाही वनमंडल में इस बहाली के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों में नाराजगी देखी जा रही है। लोगों का कहना है कि “जहाँ लापरवाही, वहीं बहाली” जैसी नीति ने विभाग की छवि को धूमिल कर दिया है। लोगों ने वन मंत्री से तत्काल ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों को जिले से हटाने की मांग की है।

स्थानीय सूत्रों का दावा है कि राकेश राठौर ने खुद कहा “मैंने मोटी रकम देकर बहाली करवाई है, अधिकारी मेरा समर्थन करते हैं, मुझे कोई कुछ नहीं कर सकता।”

यदि यह बात सत्य है, तो यह विभागीय नैतिकता और शासन के “शून्य सहनशीलता” नीति पर सीधा प्रहार है।

क्या मरवाही वनमंडल में नियमों से ऊपर है “कृपा तंत्र”……..? क्या विभाग इस मामले में निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई करेगा, या मामला फिर फाइलों में दब जाएगा?

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