
“हाईकोर्ट के नाम पर ‘सेटिंग’ का साम्राज्य! बिलासपुर शिक्षा विभाग में आदेशों की आड़ में मनमानी पोस्टिंग का बड़ा खेल उजागर”
कोर्ट और डीपीआई के स्पष्ट आदेशों को दरकिनार कर ‘हाईकोर्ट निर्देशानुसार’ लिखकर बदली गई पदस्थापनाएं, पूरे सिस्टम की साख पर सवाल

बिलासपुर।जिला शिक्षा विभाग में पदस्थापनाओं को लेकर सामने आया ताजा मामला न केवल प्रशासनिक अनियमितताओं की पोल खोलता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि किस तरह हाईकोर्ट जैसे संवैधानिक संस्थान के नाम का इस्तेमाल एक ‘ढाल’ की तरह कर नियमों को मोड़ा गया। दस्तावेज़ों और आदेशों की पड़ताल में यह साफ हुआ है कि जहां हाईकोर्ट और डीपीआई ने स्पष्ट रूप से नई पोस्टिंग का कोई निर्देश नहीं दिया, वहीं जिला स्तर पर उसी के उलट फैसले लेते हुए शिक्षकों को मनचाही जगहों पर पदस्थ किया गया और हर बार आदेशों में “हाईकोर्ट के निर्देशानुसार” लिखकर उसे वैध ठहराने की कोशिश की गई।
पूरा घटनाक्रम उस समय शुरू हुआ जब 27 दिसंबर 2024 को सहायक शिक्षकों को प्रधान पाठक पद पर पदोन्नति दी गई। यह प्रक्रिया विभागीय दिशा-निर्देशों के तहत प्रारंभ हुई थी, लेकिन काउंसिलिंग के दौरान विवाद खड़ा हो गया और पांच शिक्षक हाईकोर्ट पहुंच गए। 16 अप्रैल 2025 को हाईकोर्ट ने इस मामले में कोई नई पोस्टिंग देने का आदेश नहीं दिया, बल्कि केवल इतना कहा कि याचिकाकर्ता डीपीआई के समक्ष अपना अभ्यावेदन प्रस्तुत करें। इसके बाद 4 सितंबर 2025 को डीपीआई ने सभी अभ्यावेदन खारिज करते हुए साफ कर दिया कि पहले से जारी पदस्थापनाएं ही वैध रहेंगी और उनमें कोई बदलाव आवश्यक नहीं है।

यहीं तक मामला सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुरूप था, लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और नीयत दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। डीपीआई के स्पष्ट आदेश के बावजूद जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में बिना किसी नई काउंसिलिंग के पदस्थापनाओं में बदलाव शुरू हो गया। संशोधित आदेश जारी किए गए और हर आदेश में एक ही पंक्ति दोहराई गई—“हाईकोर्ट के निर्देशानुसार”। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि उपलब्ध दस्तावेज़ों और आदेशों में ऐसा कोई निर्देश दर्ज ही नहीं है, जिससे इन बदलावों को सही ठहराया जा सके।
दस्तावेज़ों की तुलना करने पर यह भी सामने आया कि जिन शिक्षकों को पहले दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों में पदस्थ किया गया था, उन्हें संशोधित आदेशों के जरिए शहर या उसके आसपास के सुविधाजनक स्कूलों में स्थानांतरित कर दिया गया। हलधर साहू, क्षिप्रा बघेल और सूरज कुमार सोनी जैसे मामलों में मूल और संशोधित पदस्थापनाओं के बीच स्पष्ट अंतर देखा गया, जिससे यह संदेह और गहरा हो जाता है कि यह पूरी प्रक्रिया किसी सामान्य प्रशासनिक जरूरत का हिस्सा नहीं, बल्कि सुनियोजित हस्तक्षेप और प्रभाव का परिणाम थी।

शुरुआत में यह मामला केवल उन पांच शिक्षकों तक सीमित था, जिन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन धीरे-धीरे यही पैटर्न बड़े स्तर पर लागू कर दिया गया। सूत्रों के अनुसार, बाद में करीब दस अन्य शिक्षकों की भी पदस्थापनाएं इसी आधार पर बदली गईं, जहां आदेशों में हर बार “हाईकोर्ट के निर्देशानुसार” का हवाला दिया गया, जबकि डीपीआई के आदेश में ऐसी किसी कार्रवाई की अनुमति नहीं थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि एक सीमित मामले को आधार बनाकर पूरे विभाग में एक तरह का ‘सेटिंग मॉडल’ लागू कर दिया गया।
मामले में एक और गंभीर अनियमितता तब सामने आई जब वेटिंग लिस्ट के नाम पर पदस्थापनाएं की गईं। नियमों के अनुसार वेटिंग लिस्ट केवल एक वर्ष तक ही मान्य होती है, लेकिन यहां तीन साल पुरानी डीपीसी का हवाला देकर पोस्टिंग दी गई और उसे भी “हाईकोर्ट के निर्देशानुसार आंशिक संशोधन” बताकर प्रस्तुत किया गया। यह न केवल नियमों की अनदेखी है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि आदेशों की भाषा का इस्तेमाल कैसे मनमाफिक निर्णयों को वैध ठहराने के लिए किया गया।
इतना ही नहीं, प्रमोशन आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि यदि कोई शिक्षक समय पर जॉइन नहीं करता है तो उसकी पदस्थापना स्वतः निरस्त मानी जाएगी, लेकिन ऐसे मामलों में भी बाद में संशोधन कर उन्हें फिर से पोस्टिंग दे दी गई। यहां भी वही पुराना तरीका अपनाया गया—आदेश में “हाईकोर्ट के निर्देशानुसार” जोड़कर पूरी प्रक्रिया को वैध दिखाने का प्रयास।
पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण और चिंताजनक पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने केवल अभ्यावेदन पर निर्णय लेने का निर्देश दिया था और डीपीआई ने उस निर्देश का पालन करते हुए अंतिम निर्णय भी दे दिया था। इसके बावजूद जिला स्तर पर आदेशों की अलग व्याख्या कर नई पदस्थापनाएं जारी करना न केवल प्रशासनिक नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह अदालत की अवमानना की स्थिति भी पैदा कर सकता है। कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि आदेशों को इस तरह तोड़-मरोड़कर लागू किया जाता है, तो यह सीधे-सीधे न्यायिक प्रक्रिया की अवहेलना के दायरे में आ सकता है।
इस पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी का कहना है कि सभी निर्णय शासन के निर्देशों के अनुरूप लिए गए हैं, लेकिन उपलब्ध दस्तावेज़ों में बार-बार हाईकोर्ट का हवाला देकर वास्तविक आदेशों से अलग कार्रवाई होना इस दावे को कमजोर करता है और संदेह को और गहरा करता है। सवाल अब केवल कुछ पोस्टिंग का नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर खड़ा हो गया है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब न हाईकोर्ट ने नई पोस्टिंग का आदेश दिया और न ही डीपीआई ने किसी प्रकार का संशोधन किया, तो फिर “हाईकोर्ट के निर्देशानुसार” लिखकर पदस्थापनाएं क्यों बदली गईं। क्या यह केवल एक प्रशासनिक गलती है या फिर इसके पीछे कोई सुनियोजित नेटवर्क और प्रभाव काम कर रहा है? यह सवाल अब न केवल विभाग के भीतर, बल्कि आम जनता और शिक्षकों के बीच भी चर्चा का विषय बन चुका है।
बिलासपुर शिक्षा विभाग में सामने आया यह मामला इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि यदि जवाबदेही तय नहीं होती और नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं किया जाता, तो किस तरह आदेशों की आड़ में पूरे सिस्टम को प्रभावित किया जा सकता है। अब यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि इस गंभीर मामले में जांच होती है, जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है या फिर यह भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाता है।















