
समग्र शिक्षा योजना के नाम पर टेबल खरीदी में ‘टाइमिंग का खेल’, आधी रात का फैसला बना विवाद की वजह
रायपुर, 25 अप्रैल 2026। छत्तीसगढ़ में सरकारी खरीदी व्यवस्था एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गई है। इस बार मामला स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा समग्र शिक्षा योजना के तहत बड़े पैमाने पर टेबल खरीदी के लिए जारी किए गए टेंडर से जुड़ा है। पहली नजर में यह एक सामान्य ई-टेंडर प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन इसके जारी होने का समय पूरे मामले को संदिग्ध बनाता है और अब यह मुद्दा पारदर्शिता को लेकर गंभीर बहस का विषय बन गया है।
जानकारी के अनुसार विभाग ने 27 मार्च 2026 को जैम (GeM) पोर्टल के माध्यम से टेंडर जारी किया, लेकिन इसे रात 11 बजकर 52 मिनट पर प्रकाशित किया गया। यह समय सामान्य सरकारी कार्यप्रणाली से अलग है, क्योंकि उस वक्त अधिकतर कार्यालय बंद हो चुके होते हैं और प्रशासनिक गतिविधियां लगभग समाप्त हो जाती हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी वित्तीय प्रक्रिया को आधी रात में ही क्यों शुरू किया गया। खास बात यह है कि निविदा भरने के लिए 4 मई 2026 तक का समय दिया गया है, जो लगभग 38 दिनों का लंबा अंतराल है। जब पर्याप्त समय उपलब्ध था, तो देर रात टेंडर जारी करने का निर्णय अपने आप में कई शंकाओं को जन्म देता है।
उक्त टेंडर, जिसका बिड नंबर GEM/2026/B/7398617 है, के तहत 42,858 कॉम्पोजिट ऑफिस टेबल खरीदे जाने हैं, जो निर्धारित IS 8126 V2 मानकों के अनुरूप बताए गए हैं। इतनी बड़ी मात्रा में खरीदी सीधे तौर पर करोड़ों रुपये के लेन-देन से जुड़ी मानी जा रही है, इसलिए इसकी प्रक्रिया का हर पहलू संवेदनशील हो जाता है। लेकिन जिस तरह से इसे आधी रात को जारी किया गया, उसने पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह आशंका भी जताई जा रही है कि कहीं इस प्रक्रिया को सीमित दायरे में रखकर कुछ चुनिंदा फर्मों को लाभ पहुंचाने की कोशिश तो नहीं की गई।
इस पूरे मामले को लेकर व्हिसिल ब्लोअर नरेश गुप्ता ने गंभीर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि सरकारी खरीदी जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में हर निर्णय पारदर्शी होना चाहिए। आधी रात को टेंडर जारी करना केवल तकनीकी मामला नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है। उन्होंने यह भी कहा कि यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि टेंडर किस परिस्थिति में और किसके निर्देश पर जारी किया गया, क्या उस समय अधिकृत अधिकारी उपस्थित थे और क्या पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुरूप ही संपन्न हुई।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में जैम पोर्टल के जरिए की गई खरीदी पहले भी कई बार विवादों में रही है। आदिवासी विकास विभाग द्वारा स्टील का जग बाजार मूल्य से कई गुना अधिक कीमत पर खरीदे जाने का मामला काफी चर्चित हुआ था। इसी तरह महासमुंद के एक कॉलेज में उच्च शिक्षा विभाग के तहत करीब 1.06 करोड़ रुपये की अनियमितता उजागर हुई थी। सरगुजा में अनुसूचित जाति-जनजाति विभाग द्वारा एक साधारण टीवी को एक लाख रुपये से अधिक कीमत पर खरीदे जाने का मामला भी सामने आया था। इतना ही नहीं, “श्रीराम सेल्स” नामक फर्म, जिसे सप्लाई का ठेका दिया गया था, उसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े हो गए थे। वहीं स्वास्थ्य विभाग में 104 दवाओं की खरीदी में करीब 75 करोड़ रुपये के महंगे सौदों को लेकर विवाद अब तक जारी है।
इन तमाम घटनाओं की पृष्ठभूमि में देखा जाए तो वर्तमान टेंडर का समय और प्रक्रिया और भी ज्यादा संदिग्ध प्रतीत होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही ई-टेंडरिंग प्रणाली चौबीसों घंटे सक्रिय रहती हो, लेकिन बड़े और संवेदनशील मामलों में समय का चयन भी पारदर्शिता का अहम हिस्सा होता है। आधी रात को टेंडर जारी करना तकनीकी रूप से संभव जरूर है, लेकिन यह प्रशासनिक दृष्टिकोण से कई सवाल खड़े करता है और इससे आम जनता के बीच अविश्वास की स्थिति उत्पन्न होती है।
फिलहाल इस पूरे मामले में स्कूल शिक्षा विभाग या राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यही कारण है कि यह मुद्दा अब धीरे-धीरे जनचर्चा का विषय बनता जा रहा है। आम जनता और जागरूक वर्ग इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि क्या सरकार इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश देगी या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह समय के साथ ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।
समग्र शिक्षा योजना के तहत इतनी बड़ी खरीदी और उससे जुड़ी प्रक्रिया पर उठे सवाल केवल एक टेंडर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हैं। अब देखना यह होगा कि क्या इस मामले में सच्चाई सामने आती है और जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई होती है या नहीं।
















