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पोषण से आगे बढ़ी आंगनबाड़ी: अब हर बच्चे में संस्कार और जिम्मेदार भविष्य की नींव – मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े

रायपुर (खबरो का राजा) : – राज्य की नन्ही पीढ़ी को सिर्फ कुपोषण से मुक्ति दिलाने तक सीमित नहीं रहकर अब उनके भीतर संस्कारों की मजबूत नींव रखने की दिशा में एक नई पहल आकार ले रही है। महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी रजवाड़े ने अपने निवास कार्यालय में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में प्रदेश के 52,518 आंगनबाड़ी केंद्रों को संस्कार-केन्द्र के रूप में विकसित करने का स्पष्ट संकेत दिया।बैठक में राज्य शैक्षणिक अनुसंधान केंद्र के ईसीसीई (ECCE) के राज्य स्तरीय रिसोर्स पर्सन और विभागीय अधिकारी शामिल रहे। इस दौरान यह तय किया गया कि अब आंगनबाड़ी केवल पोषण और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व और चरित्र निर्माण की पहली प्रयोगशाला बनेंगे।

3 से 6 साल जीवन की असली नींव -:

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मंत्री ने कहा कि बच्चे का पहला विद्यालय उसका घर और आंगनबाड़ी होता है। 3 से 6 वर्ष की उम्र वह दौर है जब बच्चा सबसे अधिक सीखता है और इसी समय दिए गए संस्कार उसकी पूरी जिंदगी की दिशा तय करते हैं। इसलिए अब लक्ष्य साफ है बचपन से ही ऐसे मूल्य विकसित किए जाएं जो बच्चों को एक बेहतर इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनाएं।

संस्कार आदतों में अच्छाई, व्यवहार में पहचान -:

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संस्कार परक शिक्षा को एक विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली के रूप में विकसित करने सशक्त माध्यम है। इसमें शामिल हैं बड़ों का सम्मान , सच बोलने की आदत , मिल-बांटकर खाने की संस्कृति , साफ-सफाई का व्यवहार प्रकृति के प्रति प्रेम , धन्यवाद और क्षमा जैसे शब्दों का सहज प्रयोग होता है। मंत्री ने इसे एक नवाचार बताते हुए इसे जमीनी स्तर पर लागू करने पर जोर दिया।

कैसे बदलेगा आंगनबाड़ी का माहौल :- 

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इस पहल को व्यवहार में उतारने के लिए कई सरल लेकिन प्रभावी तरीके सुझाए गए दिन की शुरुआत अनुशासन से प्रार्थना, ताली वाले योग और हल्के प्राणायाम से एकाग्रता बढ़ेगी। साथ ही पंचतंत्र लोककथाएं जैसी कहानियां चरित्र का निर्माण करती है। और कठपुतली के माध्यम से नैतिक शिक्षा जैसे त्योहारों से जुड़ाव दीवाली, हरेली, तीज, गांधी जयंती जैसी गतिविधियों से संस्कृति का जुड़ाव होना जरूरी है। बच्चो के व्यवहार में संस्कार जैसे नमस्ते, हाथ धोना, भोजन का सम्मान रोजमर्रा की आदतें शामिल होना चाहिए। प्रकृति और श्रम का सम्मान जैसे पौधे लगाना, सफाई रखना, छोटे काम खुद करना चाहिए। इन सबमे अभिभावकों की भागीदारी भी जरूरी है जो हर महीने संस्कार सभा के जरिए घर-आंगनबाड़ी का तालमेल बनाये इससे सिर्फ शरीर ही नहीं, चरित्र भी होगा मजबूत होगा। इस पहल के पीछे स्पष्ट सोच है कि बच्चों का विकास केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी होना चाहिए। इससे आत्मविश्वास और भाषा कौशल बढ़ेगा, अनुशासन और सीखने की क्षमता मजबूत होगी , स्थानीय संस्कृति और भाषा को नया जीवन मिलेगा और सबसे अहम एक संस्कारी, जिम्मेदार पीढ़ी तैयार होगी। 

आंगनबाड़ी दूसरी माँ का घर -:

मंत्री ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को दूसरी माँ की भूमिका में बताते हुए कहा कि उनका स्नेह और मार्गदर्शन ही बच्चों में वास्तविक संस्कारों का बीजारोपण करता है। आज जब समाज में मानवीय मूल्यों और रिश्तों में गिरावट की चर्चा आम है, ऐसे समय में हर आंगनबाड़ी को संस्कार केन्द्र के रूप में विकसित करना समय की मांग बन गया है। पोषण शरीर को गढ़ता है, लेकिन संस्कार समाज की नींव तैयार करते हैं।

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