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धमतरी डीईओ ने दिखाई सख्ती, जीपीएम में नियमों को कुचलकर चलता रहा अटैचमेंट खेल..!

धमतरी डीईओ ने दिखाई सख्ती, जीपीएम में नियमों को कुचलकर चलता रहा अटैचमेंट खेल..!

“अटैचमेंट का खेल या शिक्षा व्यवस्था पर खुला हमला..? 3 वर्षों से स्कूल से दूर व्याख्याता, गुरुकुल में जमे… आखिर किसके संरक्षण में चल रहा पूरा सिस्टम?”

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गौरेला-पेंड्रा-मरवाही/रायपुर।राज्य शासन द्वारा शिक्षकों, व्याख्याताओं और प्राचार्यों के सभी प्रकार के अटैचमेंट समाप्त किए जाने के स्पष्ट आदेश के बावजूद प्रदेश के कई जिलों में आज भी “अटैचमेंट उद्योग” बदस्तूर जारी है। शिक्षा विभाग अब ऐसे मामलों में सक्रिय होता दिखाई दे रहा है। जानकारी के अनुसार शासन के आदेश की अवहेलना कर शिक्षकों और प्राचार्यों को कार्यालयों, छात्रावासों और अन्य संस्थानों में अटैच करने के मामले में कई जिला शिक्षा अधिकारियों को नोटिस जारी किया गया है।

इधर धमतरी जिले में अटैचमेंट विवाद सामने आने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने तत्काल कार्रवाई करते हुए समग्र शिक्षा राज्य कार्यालय को पत्र लिखकर उस प्राचार्य का अटैचमेंट समाप्त करने की बात कही है, जिन्हें स्कूल जॉइन कराने के कुछ घंटों बाद ही फिर से कार्यमुक्त कर दिया गया था। इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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दरअसल, राज्य शासन ने 5 जून 2025 से सभी प्रकार के अटैचमेंट समाप्त करने के आदेश जारी किए थे। इसके बाद भी जिला और ब्लॉक स्तर पर बड़े पैमाने पर नियमों की अनदेखी होती रही। लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा हाल ही में सभी संभागीय संयुक्त संचालकों से ऐसे शिक्षकों, व्याख्याताओं और प्राचार्यों की जानकारी मांगी गई है जो अब भी अटैच होकर कार्यालयों और छात्रावासों में कार्यरत हैं। इससे साफ है कि विभाग को भी अब जमीनी स्तर पर चल रहे इस “अटैचमेंट खेल” की भनक लग चुकी है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले को लेकर उठ रहा है।

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सूत्रों के अनुसार विकासखंड पेंड्रा अंतर्गत शासकीय हाई स्कूल बचरवार में पदस्थ व्याख्याता जंग बहादुर चौहान को ब्लॉक बदलकर गौरेला स्थित गुरुकुल छात्रावास में प्रभारी अधीक्षक के रूप में पदस्थ कर दिया गया। सवाल यह है कि आखिर गौरेला ब्लॉक में कोई योग्य शिक्षक या व्याख्याता उपलब्ध नहीं था क्या, जिसके कारण दूसरे ब्लॉक से व्याख्याता को लाकर छात्रावास की जिम्मेदारी सौंपी गई?और उससे भी बड़ा सवाल — यदि कोई व्याख्याता लगातार तीन वर्षों तक अपनी मूल संस्था में नहीं गया, तो उस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई का क्या हुआ?

बताया जा रहा है कि संबंधित व्याख्याता संस्कृत विषय के शिक्षक हैं। संस्कृत केवल एक विषय नहीं बल्कि भाषा और भारतीय ज्ञान परंपरा की आधारशिला मानी जाती है। ऐसे में यदि शिक्षक वर्षों तक स्कूल से अनुपस्थित रहे तो विद्यार्थियों की शिक्षा गुणवत्ता किस स्तर तक प्रभावित हुई होगी, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।

प्रदेश सरकार एक ओर शिक्षा गुणवत्ता सुधारने, स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने और बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए लगातार योजनाएं चला रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर कुछ अधिकारी पूरे सिस्टम को कागजों में बदलते नजर आ रहे हैं। सबसे गंभीर प्रश्न यह भी उठ रहा है कि बिना स्कूल गए आखिर संबंधित व्याख्याता का वेतन कैसे निकलता रहा? क्या जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं थी? या फिर सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंद ली गईं? क्या यह पूरा मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही है या फिर इसके पीछे कोई बड़ी सांठगांठ और आर्थिक खेल चल रहा था?

शिक्षा विभाग में लंबे समय से यह चर्चा रही है कि “अटैचमेंट” कई जगह सुविधा नहीं बल्कि कमाई का जरिया बन चुका है। जिन शिक्षकों को स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना चाहिए, वे वर्षों तक कार्यालयों, छात्रावासों और अन्य व्यवस्थाओं में जमे रहते हैं, जबकि ग्रामीण और दूरस्थ स्कूल शिक्षकविहीन होकर शिक्षा व्यवस्था की बदहाली झेलते रहते हैं।

अब जबकि शासन स्तर पर अटैचमेंट मामलों की जानकारी तलब की जा रही है, तो गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के इस मामले पर भी जांच की मांग तेज हो गई है। स्थानीय लोगों और शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि शासन वास्तव में शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही चाहता है, तो केवल नोटिस जारी करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि वर्षों से नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई करनी होगी।

वरना सवाल यही रहेगा “जब शिक्षक स्कूल नहीं गया, तब बच्चों को पढ़ाया किसने…?और जब सबको जानकारी थी, तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई…?”

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