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“कागजी उपस्थिति, दोहरी जिम्मेदारी और वर्षों पुराना सिस्टम अब जांच के घेरे में!” जिले को मिले नए कलेक्टर डॉ. संतोष देवांगन, शिक्षा और छात्रावास व्यवस्था की परतें खुलने की बढ़ी उम्मीद

कागजी उपस्थिति, दोहरी जिम्मेदारी और वर्षों पुराना सिस्टम अब जांच के घेरे में!”

जिले को मिले नए कलेक्टर डॉ. संतोष देवांगन, शिक्षा और छात्रावास व्यवस्था की परतें खुलने की बढ़ी उम्मीद

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रायपुर -गौरेला-पेंड्रा-मरवाही- जिले में शिक्षा विभाग और छात्रावास व्यवस्था को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवाल अब और तेज हो गए हैं। कलेक्टर के सख्त आदेश—“उपस्थिति प्रमाण पत्र के बिना वेतन नहीं”—के बाद विभागीय हलचल थमने का नाम नहीं ले रही थी, और अब जिले को नए कलेक्टर डॉ. संतोष देवांगन मिलने के बाद पूरे सिस्टम की व्यापक और कड़ी जांच की चर्चाएं जोर पकड़ने लगी हैं।

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# NOC में प्रतिनियुक्ति का खेल….!

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DPI… तक पहुंचा मामला….!

सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग का यह बयान कि “यदि व्यवस्था कलेक्टर द्वारा अनुमोदित है तो अलग से NOC की आवश्यकता नहीं”—अब नई बहस का कारण बन गया है। इसके साथ ही प्रधान पाठकों को छात्रावास अधीक्षक की दोहरी जिम्मेदारी सौंपे जाने पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

जिले में अब यह माना जा रहा है कि वर्षों से जिस व्यवस्था पर केवल कागजी नियंत्रण चलता रहा, उसकी परतें नए प्रशासनिक नेतृत्व में खुल सकती हैं। खासकर प्रभारी अधीक्षक, संस्था प्रमुख, प्रधान पाठक और उन अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, जिनके प्रमाण पत्रों के आधार पर लगातार वेतन जारी होते रहे। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि यदि निष्पक्ष जांच होती है, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कई प्रभारी अधीक्षक वास्तव में कहां ड्यूटी कर रहे थे? विद्यालय में, छात्रावास में या सिर्फ उपस्थिति रजिस्टरों में? अध्यापन कार्य कितना हुआ? छात्रावास संचालन की वास्तविक स्थिति क्या रही? और जब कई मामलों में वास्तविक उपस्थिति पर ही सवाल उठते रहे, तो वेतन और प्रमाणन की प्रक्रिया आखिर किस आधार पर चलती रही?

जिले के तीनों विकास खंड में अब, आखिर कैसे चलते हैं सिस्टम,

सूत्रों के अनुसार, कई संस्थाओं में वर्षों से ऐसी व्यवस्था संचालित होने की चर्चाएं रही हैं, जहां उपस्थिति प्रमाण पत्र केवल औपचारिक दस्तावेज बनकर रह गए थे। आरोप यह भी लगते रहे हैं कि विकासखंड स्तर पर “सेटिंग”, “समायोजन” और “वसूली” की संस्कृति ने पूरे सिस्टम को प्रभावित किया। अब कलेक्टर स्तर पर सख्ती आने के बाद विभागीय गलियारों में बेचैनी साफ देखी जा रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई संस्था प्रमुख वास्तविक उपस्थिति के बिना प्रमाण पत्र जारी करता है, तो मामला केवल विभागीय लापरवाही का नहीं बल्कि शासकीय दस्तावेजों में गलत प्रमाणन और रिकॉर्ड हेरफेर तक जा सकता है। ऐसे में जिम्मेदारी केवल अधीक्षक या शिक्षक तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि प्रमाणन करने वाले अधिकारियों और निगरानी तंत्र की भूमिका भी सवालों के घेरे में आएगी।

इधर प्रधान पाठकों को छात्रावास अधीक्षक की अतिरिक्त जिम्मेदारी दिए जाने का मुद्दा भी अब गंभीर बहस का विषय बन गया है। कई मामलों में प्रधान पाठकों की मूल संस्था और छात्रावास के बीच 20 से 30 किलोमीटर तक की दूरी बताई जा रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक व्यक्ति एक ही समय में विद्यालय संचालन, अध्यापन कार्य और छात्रावास प्रबंधन जैसी तीन बड़ी जिम्मेदारियां प्रभावी तरीके से कैसे निभा सकता है?

शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि इस व्यवस्था का सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई और भविष्य पर पड़ा है। विद्यालयों में नियमित शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित हुईं, वहीं छात्रावासों की निगरानी व्यवस्था भी कमजोर होती गई। परिणामस्वरूप कई संस्थाएं केवल कागजों में संचालित होने के आरोपों से घिरती रहीं।

अब नए कलेक्टर डॉ. संतोष देवांगन से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। जिले में यह चर्चा तेज है कि नई प्रशासनिक टीम पुराने रिकॉर्ड, उपस्थिति रजिस्टर, छात्रावास संचालन, वेतन भुगतान और प्रमाण पत्रों की पूरी श्रृंखला की जांच कर सकती है। यदि ऐसा हुआ, तो कई वर्षों से दबे मामलों की परतें खुल सकती हैं और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की तलवार भी लटक सकती है।

जिले में अब आम चर्चा यही है कि क्या नए कलेक्टर केवल वर्तमान व्यवस्था को सुधारेंगे, या फिर उन पुराने मामलों की भी निष्पक्ष जांच होगी जिनमें वर्षों तक “कागजी उपस्थिति” के सहारे पूरा सिस्टम चलता रहा। आने वाले दिनों में शिक्षा विभाग और छात्रावास व्यवस्था पर प्रशासन का रुख जिले की सबसे बड़ी चर्चाओं में शामिल रहने वाला है।

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