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खबर का असर: CAMPA घोटाले में आखिरकार गिरी गाज, ₹14.77 लाख के फर्जीवाड़े में भूपेंद्र साहू निलंबित…..!

खबर का असर: CAMPA घोटाले में आखिरकार गिरी गाज, ₹14.77 लाख के फर्जीवाड़े में भूपेंद्र साहू निलंबित…..!

फर्जी गोबर खाद खरीदी, कूट रचित दस्तावेज, दबाव बनाकर राशि आहरण और शासकीय धन गबन के आरोप सत्य

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खबरों का राजा न्यूज पोर्टल ने प्रमुखता से उठाया था मामला, अब विभागीय कार्रवाई से मचा हड़कंप

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ वन विभाग में वर्ष 2022 के वृक्षारोपण कार्यों के नाम पर हुए लाखों रुपये के कथित फर्जीवाड़े में आखिरकार बड़ी कार्रवाई सामने आई है। लंबे समय से दबे इस मामले में अब विभाग ने सख्त रुख अपनाते हुए CAMPA शाखा प्रभारी रहे भूपेंद्र कुमार साहू को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।

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यह वही मामला है जिसे “खबरों का राजा न्यूज पोर्टल” ने लगातार प्रमुखता से प्रकाशित किया था। खबर प्रकाशित होने के बाद विभागीय गलियारों में हलचल तेज हुई और अब जांच में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद कार्रवाई की गई है।

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कार्यालय मुख्य वन संरक्षक बिलासपुर वृत्त द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जांच में वर्ष 2022 के वृक्षारोपण कार्य हेतु गोबर खाद खरीदी में व्यापक अनियमितता सामने आई है। जांच रिपोर्ट के अनुसार कूट रचित प्रमाण-पत्रों और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर ₹14,77,600 का अवैध लेखा समायोजन किया गया। इतना ही नहीं, समिति सचिवों पर अनैतिक दबाव बनाकर राशि आहरित करने तथा शासकीय धन के गबन जैसे गंभीर आरोप भी प्रथम दृष्टया सत्य पाए गए हैं।

जांच रिपोर्ट ने खोली विभागीय सिस्टम की बड़ी पोल

प्रधान मुख्य वन संरक्षक (सतर्कता/शिकायत) नवा रायपुर अटल नगर से प्राप्त जांच प्रतिवेदन ने पूरे मामले की गंभीरता बढ़ा दी है। जांच में यह पाया गया कि उस अवधि में CAMPA शाखा प्रभारी के रूप में कार्यरत भूपेंद्र कुमार साहू ने अपने पदीय दायित्वों का पालन नहीं किया। आदेश के अनुसार, जिन दस्तावेजों और प्रमाण-पत्रों के आधार पर भुगतान प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई, उनमें दर्शाए गए अधिकारियों की वास्तविक पदस्थापना अवधि का सत्यापन तक नहीं किया गया। हस्ताक्षरों के नमूनों का मिलान नहीं कराया गया और जावक क्रमांक को मूल अभिलेखों से जांचने की भी कोई कोशिश नहीं की गई।यानी जिस प्रक्रिया में करोड़ों की योजनाओं का हिसाब-किताब और सरकारी राशि का भुगतान होता है, वहां बुनियादी सत्यापन तक नहीं किया गया। इससे यह सवाल और गंभीर हो गया है कि क्या यह केवल लापरवाही थी या फिर सुनियोजित तरीके से पूरे सिस्टम का दुरुपयोग किया गया।

वनमंडलाधिकारी को अंधेरे में रखकर तैयार हुई !

जांच रिपोर्ट में सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि फर्जी प्रमाण-पत्रों के आधार पर एल.ओ.सी. (LOC) तैयार कराई गई और इसमें वनमंडलाधिकारी को भी अंधेरे में रखा गया। सूत्रों का कहना है कि यदि दस्तावेजों का समय पर परीक्षण किया जाता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होती, तो यह मामला उसी समय पकड़ में आ सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और लाखों रुपये का भुगतान हो गया। यह भी आरोप है कि जांच के दौरान शुरुआत में भ्रामक जानकारी दी गई। पहले कहा गया कि संबंधित प्रमाणक वर्ष 2022 के पुराने बस्ते में हैं, लेकिन बाद में प्रतिपरीक्षण के दौरान बयान बदलते हुए कहा गया कि प्रमाणक उपवनमंडल कार्यालय पेंड्रा से प्राप्त हुए। विभाग ने इस विरोधाभासी बयान को गंभीर माना है और आदेश में साफ उल्लेख किया है कि यह कर्तव्य के प्रति लापरवाही, पदीय दायित्वों की अवहेलना तथा षड्यंत्र में सहभागिता को दर्शाता है।

खबरों का राजा ने उठाया मुद्दा, फिर हरकत में आया विभाग…..!

सूत्र बताते हैं कि लंबे समय से यह मामला विभागीय स्तर पर चर्चा में था, लेकिन कार्रवाई नहीं हो रही थी। “खबरों का राजा न्यूज पोर्टल” ने जब इस पूरे प्रकरण को दस्तावेजों और तथ्यों के साथ प्रमुखता से प्रकाशित किया, तब वन विभाग में हड़कंप मच गया।

खबर सामने आने के बाद अधिकारियों पर कार्रवाई का दबाव बढ़ा और अंततः विभाग को जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद निलंबन जैसी कार्रवाई करनी पड़ी।अब यह माना जा रहा है कि यदि मीडिया लगातार इस मामले को नहीं उठाता, तो संभवतः यह मामला भी फाइलों में दबा रह जाता।

केवल निलंबन से खत्म नहीं होंगे सवाल….!

हालांकि विभाग ने सहायक ग्रेड-02 पर कार्रवाई कर दी है, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इतने बड़े वित्तीय फर्जीवाड़े में केवल एक कर्मचारी ही जिम्मेदार था? फर्जी प्रमाण-पत्र तैयार हुए, भुगतान प्रक्रिया पूरी हुई, LOC जारी हुई, राशि का आहरण हुआ — तो आखिर उस पूरी प्रक्रिया में शामिल अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय कब होगी? वन विभाग के भीतर अब यह चर्चा तेज है कि यदि निष्पक्ष और व्यापक जांच हुई, तो कई और अधिकारियों की भूमिका भी सामने आ सकती है।

शासन की “जीरो टॉलरेंस” नीति पर भी नजर….!

राज्य सरकार लगातार भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेंस” की बात कर रही है। ऐसे में यह मामला शासन की कार्यप्रणाली और निगरानी तंत्र पर भी सवाल खड़े कर रहा है। वर्ष 2022 का मामला 2026 में जाकर कार्रवाई तक पहुंचा। यानी लाखों रुपये के फर्जीवाड़े की जांच और जिम्मेदारी तय करने में वर्षों लग गए। अब जनता यह जानना चाहती है कि गबन की राशि की वसूली होगी या नहीं? क्या पूरे नेटवर्क की जांच होगी? और क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर आपराधिक प्रकरण भी दर्ज होगा?

निलंबन अवधि में मुख्यालय बिलासपुर निर्धारित..!

मुख्य वन संरक्षक बिलासपुर वृत्त द्वारा जारी आदेश के अनुसार निलंबन अवधि में भूपेंद्र कुमार साहू का मुख्यालय कार्यालय मुख्य वन संरक्षक बिलासपुर वृत्त बिलासपुर निर्धारित किया गया है। उन्हें बिना सक्षम अनुमति मुख्यालय छोड़ने की अनुमति नहीं होगी। साथ ही उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता दिए जाने का प्रावधान भी आदेश में उल्लेखित है।

फिलहाल इस कार्रवाई के बाद वन विभाग में हड़कंप का माहौल है और अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या जांच केवल निलंबन तक सीमित रहेगी या फिर पूरे घोटाले की परतें खोलते हुए बड़े अधिकारियों तक कार्रवाई पहुंचेगी।

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