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वैध रॉयल्टी, वन क्षेत्र से बाहर उत्खनन… फिर भी वन विभाग की दबिश! मारपीट, वाहन जब्ती और 2 लाख की मांग और निजी वाहन भी निशाने पर, क्यों..?

मिथलेश आयम की रिपोर्ट, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले में वन विभाग की एक कार्रवाई अब कानून व्यवस्था, अधिकार क्षेत्र और कथित अवैध वसूली को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। मामला खनिज विभाग से विधिवत अनुमति प्राप्त रेत परिवहन से जुड़ा है, जहां रॉयल्टी भुगतान के बावजूद न केवल रेत से भरे वाहन को रोका गया, बल्कि एक निजी कार, मोबाइल फोन और चाबियां भी जब्त किए जाने के आरोप लगे हैं।पहले तथ्य: खनिज विभाग की कार्रवाई और रॉयल्टी

प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम केवची गौरेला निवासी विमलेश मार्को पिता बिरन सिंह के विरुद्ध अवैध उत्खनन के एक प्रकरण में खनिज विभाग द्वारा खान एवं खनिज विकास अधिनियम, 2009 के तहत कार्रवाई की गई थी। इस कार्रवाई के अंतर्गत ₹47,929 का अर्थदंड चालान के माध्यम से जमा कराया गया।

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अर्थदंड जमा होने के बाद खनिज विभाग द्वारा रॉयल्टी के आधार पर 6 घनमीटर रेत ग्राम केवची से ग्राम ठेंगा डांड तक परिवहन के लिए स्वीकृति दी गई।

रॉयल्टी के बावजूद रोका गया वाहन

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दिनांक 02 फरवरी 2026 को उक्त रेत वाहन क्रमांक CG 10 BD 6256 से परिवहन की जा रही थी। वाहन को चालक राजू चला रहा था तथा वाहन में सुल्तान भी मौजूद था। 

आरोप है कि ग्राम जोबा टोला के पास वन विभाग के कर्मचारियों ने वाहन को रोक लिया। चालक द्वारा रॉयल्टी से संबंधित वैध दस्तावेज दिखाने के बावजूद वन विभाग के कर्मचारी संतुष्ट नहीं हुए।

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मारपीट, धमकी और जब्ती के आरोप

शिकायत के अनुसार इसी दौरान चालक राजू और वाहन में बैठे सुल्तान के साथ मारपीट की गई। मोबाइल फोन और वाहन की चाबियां छीन ली गईं तथा जान से मारने की धमकी भी दी गई। बताया गया कि किसी तरह दोनों जान बचाकर मौके से भागे और वाहन स्वामी को घटना की सूचना दी।

निजी वाहन भी निशाने पर, क्यों?

घटना की जानकारी मिलने पर वाहन स्वामी सुलेमान खान जब मौके पर पहुंचे तो वन विभाग के कर्मचारियों से बातचीत हुई। आरोप है कि इस दौरान रेंजर प्रबल दुबे द्वारा वाहन और रेत छोड़ने के एवज में 2 लाख रुपये की मांग की गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि मांग पूरी न होने पर वन विभाग के कर्मचारियों ने न केवल रेत से लदे वाहन को रोका, बल्कि आवेदक की निजी अल्टो 800 कार को भी जब्त कर उसकी चाबी छीन ली।

यहीं से मामला और गंभीर हो जाता है। सवाल यह उठता है कि

 • जब उत्खनन वन विभाग के क्षेत्र में हुआ ही नहीं,

 • जब रेत रॉयल्टी भुगतान के बाद वैध रूप से परिवहन की जा रही थी,

 • और यदि किसी प्रकार की कार्रवाई बनती भी थी तो वह केवल रेत परिवहन कर रहे वाहन तक सीमित होनी चाहिए थी,

तो फिर एक निजी वाहन को रोकने और जब्त करने का अधिकार किस कानून के तहत लिया गया?

वसूली या द्वेष?

पूरे घटनाक्रम को देखते हुए यह सवाल स्वाभाविक रूप से खड़ा हो रहा है कि कहीं यह कार्रवाई कानून के पालन के नाम पर वसूली का प्रयास तो नहीं थी? या फिर किसी द्वेष की भावना से ग्रसित होकर दबाव बनाने की कार्रवाई की गई?

पुलिस अधीक्षक से शिकायत, जांच की मांग

वाहन स्वामी सुलेमान खान द्वारा पूरे मामले की लिखित शिकायत पुलिस अधीक्षक गौरेला-पेंड्रा-मरवाही को सौंपी गई है। शिकायत में निष्पक्ष जांच, वाहन व सामान की वापसी और दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की गई है।

फिलहाल वन विभाग की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। अब देखना यह होगा कि जांच में क्या सामने आता है यह कार्रवाई कानून के दायरे में थी या फिर पद और अधिकार का दुरुपयोग। जांच के बाद ही सच्चाई पूरी तरह सामने आ पाएगी, लेकिन फिलहाल यह मामला प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर रहा है।

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