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“नियमों की कब्र पर ‘सेटिंग का साम्राज्य’! GPM में DEO की मेहरबानी से एक ही नाम बार-बार सिस्टम में हावी”

“DPI के बार-बार आदेश भी बेअसर! गौरेला–पेंड्रा–मरवाही में DEO की मनमानी, बिना अनुमति ‘चहेते’ को दी जिला स्तर की कुर्सी”

संलग्नीकरण बंद… लेकिन ‘सेटिंग’ चालू!

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उल्लास साक्षरता मिशन के नाम पर बड़ा खेल? विभागीय आदेश ने ही बता दी पूरी ‘अंदरूनी कहानी’

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही। जिले के शिक्षा विभाग में एक बार फिर नियमों को ताक पर रखकर की जा रही मनमानी उजागर हुई है। राज्य शासन द्वारा संलग्नीकरण (अटैचमेंट) पूरी तरह समाप्त किए जाने के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) द्वारा एक व्याख्याता को जिला स्तर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपते हुए न केवल नियमों की अनदेखी की गई, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह पूरा मामला उल्लास साक्षरता मिशन के तहत जारी एक आदेश से सामने आया है, जिसमें जिला स्तरीय मॉनिटरिंग दल के गठन की आड़ में एक व्याख्याता को “जिला नोडल अधिकारी” बनाकर जिला शिक्षा कार्यालय में संलग्न दर्शाया गया है। आदेश ही बना सबसे बड़ा सबूत
जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट रूप से श्री मुकेश कोरी (व्याख्याता) को जिला नोडल अधिकारी के रूप में दर्शाया गया है। इतना ही नहीं, आदेश में उनकी पदस्थापना जिला साक्षरता मिशन कार्यालय (DEO कार्यालय) में भी दिखाई गई है।
लेकिन वास्तविक स्थिति कुछ और ही कहानी बयां करती है—मुकेश कोरी की मूल पदस्थापना सेजेस धनौली में है उनके नाम पर राज्य शासन द्वारा कोई वैध नियुक्ति आदेश जारी नहीं हुआ किसी प्रकार की प्रतिनियुक्ति (डिपुटेशन) की स्वीकृति भी नहीं है
ऐसे में यह पूरा मामला सीधे तौर पर नियमों के विपरीत नजर आता है।

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DPI के आदेश के बाद भी ‘पावर प्ले’ जारी

इस पूरे प्रकरण को और गंभीर बनाता है लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) का हालिया आदेश, जिसमें तीसरी बार स्पष्ट रूप से संलग्नीकरण समाप्त करने के निर्देश जारी किए गए हैं। आदेश में कहा गया है कि, सभी संलग्न शिक्षकों एवं कर्मचारियों को तत्काल उनके मूल संस्थान में कार्यमुक्त किया जाए किसी भी प्रकार का अनाधिकृत अटैचमेंट स्वीकार्य नहीं होगा इसके बावजूद जिले में जारी यह आदेश कई सवाल खड़े करता है—

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क्या DEO ने DPI के निर्देशों को नजरअंदाज किया?

क्या जिले में ‘मनपसंद पोस्टिंग’ का खेल अब भी जारी है?क्या अधिकारी खुद को शासन के आदेशों से ऊपर मान रहे हैं?उल्लास मिशन या ‘पद वितरण मिशन’?
उल्लास साक्षरता कार्यक्रम का उद्देश्य जहां नवसाक्षरों को शिक्षा से जोड़ना है, वहीं इस तरह के विवादास्पद आदेश योजना की मंशा पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार—
“यह सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि प्रभाव और नियंत्रण का मामला है।” “जिला स्तर पर बैठाकर प्रशासनिक फैसलों में भूमिका देने की रणनीति हो सकती है।” स्कूलों पर असर: पढ़ाई कौन संभालेगा?
सबसे अहम सवाल जमीनी स्तर पर शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठता है,जब एक व्याख्याता को बिना प्रक्रिया जिला मुख्यालय में बैठा दिया जाएगा, तो उसके मूल विद्यालय में पढ़ाई कौन करेगा? क्या इससे शिक्षकों की कमी और नहीं बढ़ेगी?यह सीधा असर छात्रों की पढ़ाई और शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ने वाला मामला है।
प्रशासन की चुप्पी, संदेह गहरा इस पूरे मामले में अब तक जिला प्रशासन या उच्च अधिकारियों की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। क्या यह मौन सहमति है? या फिर मामला दबाने की कोशिश?
बड़े सवाल, जिनका जवाब जरूरी
बिना शासन अनुमति के नोडल अधिकारी की नियुक्ति कैसे हुई? क्या अन्य योग्य शिक्षकों की अनदेखी की गई? क्या यह आदेश नियमों के खिलाफ होते हुए भी जानबूझकर जारी किया गया? क्या इस पर विभागीय जांच होगी? निष्कर्ष: नियम कमजोर या ‘जुगाड़’ मजबूत?यह मामला सिर्फ एक आदेश का नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल है। जब शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद इस तरह की नियुक्तियां होती हैं, तो यह संदेश जाता है कि— “नियम सिर्फ कागजों में हैं, असल में ‘जुगाड़’ ही सिस्टम चला रहा है।”
अब देखना यह है कि शासन इस गंभीर अनियमितता पर सख्ती दिखाता है या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।

मुकेश कोरी की सेटिंग के बड़ा चर्चा कई डीईओ बदल गए लेकिन एक व्याख्याता के इतना सेटिंग पता नहीं अधिकारियों को क्या घूंट पिला देता है कि उसको ही कार्यालय में अटैच कर लिया जाता है। जबकि कई बार शासन से अटैचमेंट का खेला जिले में थामने का नाम ही नहीं ले रहा है अच्छा समाचार बनाए

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