
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही : भदौरा में PM आवास का ‘खेल’! पक्के मकान, ट्रैक्टर और जमीन वालों को भी बांट दी सरकारी रकम…?
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। गरीबों को पक्का मकान देने के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री आवास योजना ग्राम पंचायत भदौरा में ही सवालों के घेरे में आ गई है। उपलब्ध शिकायत और सूची ने योजना की पात्रता प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि जिनके पास पहले से पक्के और डबल स्टोरी मकान हैं, जिनके पास 2.5 एकड़ से अधिक जमीन है, ट्रैक्टर-कार हैं और कुछ मामलों में सरकारी नौकरी तक होने की जानकारी दर्ज है, उन्हें भी योजना का लाभ पहुंचाया गया। कई नामों के सामने ₹40 हजार, ₹95 हजार, ₹1 लाख और ₹1.20 लाख तक राशि जारी अथवा निकाले जाने का उल्लेख है।


पक्के मकान वालों को PM आवास क्यों?

रामसिंह/मोतीलाल और रुकमीन बाई/मोतीलाल के सामने डबल स्टोरी पक्का मकान होने की जानकारी दर्ज है। देवकी/अवधराम, मुन्नीबाई/हरनाम, कमलदेव/हरनाम, गया प्रसाद/पारस और मिश्रीलाल/प्रेमसिंह सहित कई नामों के सामने पहले से पक्का मकान होने की आपत्ति है। इसके बावजूद कई मामलों में ₹40 हजार राशि निकाले जाने अथवा जारी होने का उल्लेख है। सवाल यह है कि अगर मकान पहले से मौजूद था तो PM आवास की पात्रता कैसे तय हुई?
डबल स्टोरी मकान और खाते में ₹1 लाख!

जनक/दादुराम, महेश/धक्के और हिरा/भद्दू के नाम के सामने डबल स्टोरी मकान होने की जानकारी दर्ज है, जबकि प्रत्येक के सामने ₹1 लाख राशि जारी होने का उल्लेख है। अगर जांच में मकान की स्थिति और भुगतान दोनों सही पाए जाते हैं, तो फिर यह जानना जरूरी होगा कि पात्रता जांच के दौरान जिम्मेदारों ने आखिर क्या देखा?
ट्रैक्टर-जमीन वालों को भी सरकारी आवास?
दीपक ठाकुर के नाम के सामने 2.5 एकड़ से अधिक भूमि और ₹95 हजार राशि का उल्लेख है। केशव/कुने के सामने ट्रैक्टर और 2.5 एकड़ से अधिक भूमि होने की आपत्ति के साथ ₹40 हजार राशि जारी होने का उल्लेख है। तोपसिंह/तोलाराम के मामले में ट्रैक्टर एवं 2.5 एकड़ से अधिक भूमि के साथ ₹1.20 लाख राशि जारी होने की बात दर्ज है। नवमी/लवकुश के नाम के सामने भी 2.5 एकड़ से अधिक भूमि और ₹1.20 लाख राशि का उल्लेख है।
कार, ट्रैक्टर और सरकारी नौकरी—फिर भी पात्रता?
शालिनी/अवध के नाम के सामने कार, ट्रैक्टर और सरकारी नौकरी होने की जानकारी दर्ज है। यदि यह जानकारी सरकारी अभिलेखों से सत्यापित होती है, तो मामला और गंभीर हो जाता है। सवाल फिर वही—पात्रता की जांच किसने की और किस आधार पर नाम स्वीकृत हुआ?
एक ही परिवार में पति-पत्नी दोनों को आवास?
थामन/खज्जू के नाम के सामने पति-पत्नी दोनों को आवास का लाभ दिए जाने की आपत्ति दर्ज है और ₹40 हजार राशि जारी होने का उल्लेख है। अब विभाग को यह भी स्पष्ट करना होगा कि क्या दोनों अलग-अलग आवास के पात्र थे? यदि नहीं, तो दोहरा लाभ किस प्रक्रिया के तहत स्वीकृत हुआ?
सरकारी रकम किसके भरोसे बांटी गई?
सबसे बड़ा सवाल सिर्फ हितग्राहियों पर नहीं, बल्कि सत्यापन और स्वीकृति की पूरी व्यवस्था पर है। योजना में नाम दर्ज करने से लेकर स्थल निरीक्षण, जियो-टैगिंग, दस्तावेजों की जांच और राशि जारी करने तक कई स्तरों पर प्रक्रिया होती है। ऐसे में यदि शिकायत में दर्ज आपत्तियां सही साबित होती हैं तो यह पता लगाना जरूरी होगा कि चूक कहां हुई—या फिर कहीं जानबूझकर नियमों को नजरअंदाज तो नहीं किया गया?
अब भदौरा की फाइल खुलेगी या दब जाएगी?
मामले में अब जनपद पंचायत CEO से निष्पक्ष जांच की मांग उठना स्वाभाविक है। जांच सिर्फ कागजों तक सीमित न रखकर हर हितग्राही के घर का मौके पर सत्यापन, भूमि रिकॉर्ड की जांच, ट्रैक्टर-वाहन का रिकॉर्ड, सरकारी नौकरी की जानकारी, जियो-टैगिंग और बैंक भुगतान की पड़ताल की जानी चाहिए। तभी पता चलेगा कि शिकायत में लगाए गए आरोप कितने सही हैं और सरकारी राशि वास्तव में किन लोगों तक पहुंची।
गरीबों के हक का सवाल, जवाबदेही तय होगी या नहीं?
प्रधानमंत्री आवास योजना गरीब परिवारों के लिए है। अगर जांच में यह साबित होता है कि अपात्र लोगों को नियमों के विपरीत सरकारी राशि दी गई, तो मामला केवल अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा; शासकीय राशि की वसूली और जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई का सवाल भी उठेगा। फिलहाल आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही होगी, लेकिन भदौरा की यह सूची विभाग के सामने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर चुकी है—गरीबों के घर के नाम पर जारी हुई रकम आखिर किसके घर पहुंची?















