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जीगौरेला पेंड्रा मरवाही_में शिक्षा व्यवस्था का बुरा हाल- न तो स्कूलों में शिक्षक, न छात्रावासों में जिम्मेदारी—फिर भी वेतन हो रहे जारी

जिले में शिक्षा व्यवस्था का बुरा हाल- न तो स्कूलों में शिक्षक, न छात्रावासों में जिम्मेदारी—फिर भी वेतन हो रहे जारी

5 हजार महीने की सेटिंग की चर्चा जोरों पर

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गौरेला पेंड्रा मरवाही।* जिले में शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली अब सीधे-सीधे सवालों के घेरे में आ गई है। अधिवासी विकास विभाग में हॉस्टल अधीक्षक के रूप में पदस्थ कई शिक्षक अपनी मूल जिम्मेदारियों से पूरी तरह गायब नजर आ रहे हैं। इसे न ही विभाग के अधिकारी इसकी अच्छे से देख रेख भी नहीं कर रहे हैं,नियम साफ कहते हैं कि ऐसे शिक्षकों को हॉस्टल की देखरेख के साथ-साथ अपने मूल स्कूलों में नियमित अध्यापन कार्य भी करना अनिवार्य है, लेकिन जमीनी हकीकत चौंकाने वाली है।

जानकारी के अनुसार, बड़ी संख्या में शिक्षक न तो स्कूलों में पढ़ाने पहुंच रहे हैं और न ही हॉस्टलों में उनकी नियमित मौजूदगी देखने को मिल रही है। यानी स्थिति यह बन गई है कि न छात्रों को पढ़ाई मिल रही है और न ही हॉस्टल में उन्हें सही देखरेख। इसके बावजूद इन शिक्षकों को हर महीने नियमित वेतन जारी किया जा रहा है, जो सीधे-सीधे सिस्टम की निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सूत्रों के मुताबिक इस पूरे खेल के पीछे 5 हजार रुपए महीना की कथित “सेटिंग” का नेटवर्क सक्रिय है। चर्चा है कि इस व्यवस्था में खंड शिक्षा अधिकारियों(BEO) की भूमिका पर भी उंगलियां उठ रही हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से यह मामला सामने आ रहा है, उसने पूरे शिक्षा तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

इस लापरवाही का सबसे बड़ा खामियाजा उन छात्रों को भुगतना पड़ रहा है, जिनके स्कूल पहले से ही शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं खासकर युक्तियुक्करण होने के बाद और ऐसे हालात में शिक्षकों के नहीं पहुंचने से कक्षाएं ठप पड़ रही हैं, बच्चों का शैक्षणिक स्तर गिर रहा है और भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। वहीं हॉस्टलों में अधीक्षीय जिम्मेदारी का अभाव बच्चों की सुरक्षा और दैनिक व्यवस्था को भी प्रभावित कर रहा है।

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यह स्थिति सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक संगठित अव्यवस्था की ओर इशारा करती है, जहां जिम्मेदारियां कागजों में निभाई जा रही हैं और जमीनी स्तर पर पूरी तरह नजरअंदाज की जा रही हैं। सवाल यह है कि जब शिक्षक न स्कूल में हैं और न ही हॉस्टल में, तो आखिर वेतन किस काम का दिया जा रहा है और इसकी निगरानी कौन कर रहा है?

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