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शासन कह रहा अटैचमेंट खत्म, लेकिन जीपीएम में अब भी जारी ‘सेटिंग सिस्टम’! स्कूल छोड़ ऑफिसों और छात्रावासों में जमे प्राचार्य जी. ए. अश्वनी कुमार,-व्याख्याता जंग बहादुर चौहान,”

शासन कह रहा अटैचमेंट खत्म, लेकिन जीपीएम में अब भी जारी ‘सेटिंग सिस्टम’! स्कूल छोड़ ऑफिसों और छात्रावासों में जमे प्राचार्य जी. ए. अश्वनी कुमार,-व्याख्याता जंग बहादुर चौहान,”

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। शिक्षा विभाग में अटैचमेंट और ब्लॉक बदलकर पदस्थापना को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े होने लगे हैं। प्रदेश सरकार जहां लगातार अटैचमेंट समाप्त करने और शिक्षकों-प्राचार्यों को मूल संस्था में पदस्थ करने की बात कह रही है, वहीं गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में जमीनी स्थिति अलग दिखाई दे रही है। जिला गठन के पांच वर्ष बाद भी विभागीय व्यवस्था पुराने ढर्रे पर चलती नजर आ रही है, जिससे प्रशासनिक कार्यप्रणाली और शिक्षा व्यवस्था दोनों पर सवाल उठ रहे हैं। जिले में एक ओर प्राचार्य स्तर के अधिकारी दूसरे जिले के कार्यालय में संलग्न बताए जा रहे हैं, तो दूसरी ओर ब्लॉक बदलकर व्याख्याताओं को दूसरी जगह जिम्मेदारी सौंपे जाने को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। अब यह मामला केवल अटैचमेंट तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि विभागीय कार्यप्रणाली और पदस्थापना व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

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दूसरे जिले में प्राचार्य संलग्न, आखिर किस आधार पर….?

जानकारी के अनुसार गुरुकुल से जुड़े प्राचार्य जी.ए. आश्विन कुमार वर्तमान में बिलासपुर ट्राइबल विभाग में संलग्न बताए जा रहे हैं। जबकि गौरेला-पेंड्रा-मरवाही स्वयं स्वतंत्र जिला बन चुका है और यहां प्रशासनिक व्यवस्था अलग संचालित हो रही है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि जब शासन स्तर पर अटैचमेंट समाप्त करने के निर्देश लागू हैं, तब एक प्राचार्य का दूसरे जिले में संलग्न रहना किस नियम के तहत संभव हो रहा है? शिक्षा विभाग के भीतर यह चर्चा भी है कि यदि जिला गठन के बाद भी दूसरे जिलों पर निर्भरता बनी हुई है, तो फिर नए जिले की प्रशासनिक व्यवस्था की मजबूती पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है।

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पेंड्रा के व्याख्याता को गौरेला में प्रभारी अधीक्षक की जिम्मेदारी….?

इसी बीच एक और मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। जानकारी के अनुसार पेंड्रा विकासखंड के शासकीय हाईस्कूल बचरवार में पदस्थ संस्कृत विषय के व्याख्याता जंग बहादुर चौहान को गौरेला-पेंड्रा-मरवाही क्षेत्र में प्रभारी अधीक्षक कार्य के लिए आदेशित किया गया है। अब इस आदेश को लेकर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि आखिर गौरेला विकासखंड में क्या प्रभारी अधीक्षक कार्य के लिए योग्य अधिकारी या शिक्षक उपलब्ध नहीं थे, जो दूसरे ब्लॉक से व्याख्याता को जिम्मेदारी देनी पड़ी? यदि स्थानीय स्तर पर पात्र और योग्य कर्मचारी मौजूद हैं, तो फिर ब्लॉक बदलकर पदस्थापना की आवश्यकता क्यों पड़ी?

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क्या ब्लॉक स्तर पर संसाधनों की कमी या सिस्टम की कमजोरी….?

इस पूरे मामले को लेकर शिक्षा विभाग की आंतरिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकारों का कहना है कि सामान्यतः किसी भी विकासखंड में उपलब्ध संसाधनों और स्टाफ के आधार पर जिम्मेदारियां तय की जाती हैं। लेकिन यदि दूसरे ब्लॉक से कर्मचारियों को बुलाकर व्यवस्थाएं चलाई जा रही हैं, तो यह स्थानीय प्रशासनिक कमजोरी को दर्शाता है। कई लोगों का मानना है कि यह स्थिति दो संभावनाओं की ओर इशारा करती है—या तो संबंधित ब्लॉक में व्यवस्थाएं कमजोर हैं अथवा फिर विभागीय स्तर पर चयन और पदस्थापना प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से संचालित नहीं हो रही।

शिक्षा व्यवस्था पर पड़ रहा असर…..!

शिक्षकों और व्याख्याताओं को मूल शैक्षणिक कार्य से हटाकर अतिरिक्त प्रशासनिक दायित्व देने का असर सीधे शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता है। स्कूलों में पहले ही शिक्षकों की कमी को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यदि व्याख्याताओं को ब्लॉक बदलकर छात्रावास या अन्य प्रशासनिक कार्यों में लगाया जाएगा, तो पढ़ाई व्यवस्था प्रभावित होना तय माना जा रहा है।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि व्याख्याता का मूल कार्य विद्यार्थियों को पढ़ाना है। यदि लंबे समय तक उन्हें कार्यालयीन या छात्रावासीय दायित्वों में लगाया जाएगा, तो इससे स्कूलों में शिक्षण व्यवस्था कमजोर होगी।

शासन के आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित…?

प्रदेश सरकार और लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा लगातार यह कहा जा रहा है कि अटैचमेंट समाप्त किए जाएं और सभी अधिकारी-कर्मचारी मूल संस्था में कार्य करें। लेकिन गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में सामने आ रहे मामलों ने इन दावों की वास्तविकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक ओर दूसरे जिले में प्राचार्य का संलग्नीकरण और दूसरी ओर ब्लॉक बदलकर व्याख्याता को प्रभारी अधीक्षक की जिम्मेदारी दिए जाने से अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या *शासन के आदेश सिर्फ फाइलों तक सीमित होकर रह गए हैं?

स्थानीय लोगों और शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारियों का कहना है कि ऐसे मामलों की विभागीय स्तर पर निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। साथ ही यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि किन नियमों और किन प्रशासनिक आवश्यकताओं के आधार पर ऐसे आदेश जारी किए गए। अब जिले में सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है कि क्या शिक्षा विभाग वास्तव में पारदर्शी और नियम सम्मत तरीके से संचालित हो रहा है, या फिर आज भी कुछ व्यवस्थाएं प्रभाव और साठ गांठ के आधार पर चल रही है ?

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