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नया चोला, पुरानी फितरत, मरवाही वनमंडल – दागी चेहरों पर मेहरबानी या भ्रष्टाचार की नई ‘जुगलबंदी’?

मिथलेश आयम की रिपोर्ट, गौरेला पेंड्रा मरवाही : छत्तीसगढ़ का मरवाही वनमंडल भ्रष्टाचार के आरोपों की तपिश में है। जिस वनमंडल को जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा गया था, वहां अब ‘नियमों की बलि’ देकर चहेते ठेकेदारों को उपकृत करने का गंदा खेल खेला जा रहा है। सवाल यह है कि क्या विभाग की फाइलें पिछली गलतियों से सबक लेती हैं, या फिर रसूख के आगे नियमों की स्याही फीकी पड़ जाती है?

​’करोड़ों का खेल’ और दागी अतीत

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​यह वही विभाग है जहां पूर्व में मनरेगा सामग्री सप्लाई के नाम पर करोड़ों की बंदरबांट हुई थी। मामला इतना गहरा था कि विधानसभा की दहलीज तक गूंजा। तब के वन मंत्री ने सदन में गरजते हुए कार्रवाई का भरोसा दिया था। नतीजा क्या हुआ? छोटे अधिकारियों पर गाज गिरी, निलंबन हुए, डिमोशन हुए, लेकिन असली ‘खिलाड़ी’ (प्रोपाइटर बॉबी शर्मा) पर हाथ डालने की जहमत किसी ने नहीं उठाई।

​नया चोला, पुरानी फितरत

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​आज चर्चा आम है कि उसी दागी अतीत वाले शख्स ने ‘नाम बदलकर’ विभाग में फिर से अपनी जड़ें जमा ली हैं। यह महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि गहरी मिलीभगत का स्पष्ट संकेत है ​

नाम बदला, नीयत नहीं: पुरानी फर्म बदनाम हुई तो नई पहचान के साथ फिर से करोड़ों के टेंडर हथिया लिए गए।

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​नियमों की धज्जियां: मुनारा निर्माण से लेकर सीसी रोड तक के काम इसी ‘चहेती फर्म’ की झोली में डाल दिए गए।

​गुणवत्ता से खिलवाड़: आरोप है कि निर्माण में रद्दी सामग्री का इस्तेमाल हो रहा है, जो सरकारी खजाने की खुली लूट के सिवा और कुछ नहीं है।

​साय सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ को चुनौती?

​एक तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का सख्त रुख है कि “भ्रष्टाचारियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा”, लेकिन मरवाही वनमंडल में उनके ये आदेश बेअसर नजर आ रहे हैं। करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार में संलिप्त ठेकेदार पर कार्रवाई करने के बजाय, उसे दोबारा काम सौंपना सिस्टम के मुंह पर तमाचा है। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि खुली मिलीभगत और संरक्षण की ओर इशारा करता है। अगर ऐसे ‘सफेदपोश’ अपराधियों को सजा नहीं मिली, तो सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति केवल कागजी बयानबाजी बनकर रह जाएगी। ​कड़वा सवाल: क्या मरवाही वनमंडल में ईमानदार ठेकेदारों का अकाल पड़ गया है? या फिर पुराने ‘लेन-देन’ के रिश्तों को निभाने के लिए नियमों को ताक पर रखना अधिकारियों की मजबूरी बन गया है?

​जब विधानसभा में घोषणा के बावजूद मुख्य सूत्रधार सुरक्षित बच निकले और दोबारा मलाईदार काम पा लें, तो सिस्टम की पारदर्शिता का जनाजा निकलना तय है। क्या यह उच्च अधिकारियों का वरदहस्त है या जांच एजेंसियों की आंखों पर बंधी पट्टी? यह मामला केवल एक ठेकेदार का नहीं, बल्कि उस दीमक का है जो छत्तीसगढ़ के वन विभाग के विकास कार्यों को भीतर से खोखला कर रहा है। जनता जवाब चाहती है आखिर कब थमेगा यह लूट का सिलसिला? ​

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