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सागौन के बेशकीमती पेड़ों पर चली सरेआम कुल्हाड़ी; शिकायतें डस्टबिन में, जांच के नाम पर सिर्फ लीपापोती रसूखदारों का जिल्दा पंचायत मे खुलेआम कब्जा का खेल 

मिथलेश आयम, गौरेला-​पेंड्रा-मरवाही : वन परिक्षेत्र पेंड्रा का जिल्दा बीट इन दिनों वन माफियाओं और अवैध कब्जाधारियों के लिए ‘खुला चारागाह’ बन चुका है। ग्राम पंचायत जिल्दा बीट से वनभूमि पर अवैध अतिक्रमण और बेशकीमती सागौन के पेड़ों की अंधाधुंध कटाई का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने वन विभाग के दावों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। इस पूरे खेल में सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि सब कुछ जानते हुए भी जिम्मेदार अधिकारी जांच के ‘जाल’ में फंसा जिल्दा बीट का सच कार्रवाई के नाम पर अफसरों की चुप्पी है।

​साहब लोगो की जेब गर्म या रसूखदारों का खौफ :-

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​स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, जिल्दा बीट की सरकारी वनभूमि पर भू-माफियाओं द्वारा धड़ल्ले से कब्जा किया जा रहा है। मामले की लिखित और मौखिक शिकायतें कई बार की जा चुकी हैं। हर बार अधिकारियों ने ‘जांच के बाद उचित कार्रवाई’ का रटा-रटाया जुमला उछाला, लेकिन हकीकत यह है कि आज तक एक इंच अतिक्रमण भी नहीं हटाया जा सका। अब क्षेत्र में यह तीखा सवाल तैर रहा है कि आखिर वन अमला किसके दबाव में नतमस्तक है? क्या रसूखदारों के आगे विभाग ने घुटने टेक दिए हैं या फिर ‘मलाई’ के फेर में कार्रवाई की फाइल दबा दी गई है?

​हरे-भरे जंगल को बना दिया ‘श्मशान’, सागौन तस्करों की चांदी :-

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​अतिक्रमणकारियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्होंने अब वन संपदा को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया है। जिस सर्किल में अतिक्रमण हो रहा है, ठीक उसी नाक के नीचे से सागौन जैसे करोड़ों के बेशकीमती पेड़ों को काटकर गायब किया जा रहा है। रात-दिन कुल्हाड़ियां चल रही हैं, जंगल के जंगल साफ किए जा रहे हैं, लेकिन गश्त करने का दम भरने वाला वन अमला दफ्तरों से बाहर निकलने को तैयार नहीं है। सरकारी संपत्ति की इस लूट से शासन को लाखों-करोड़ों के राजस्व का चूना लग रहा है।

कागजों पर पर्यावरण, धरातल पर विनाश :- 

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​एक तरफ सरकार पर्यावरण बचाने के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये विज्ञापनों और पौधारोपण पर फूंक रही है, वहीं दूसरी तरफ पेंड्रा के जिल्दा बीट में तैयार जंगल को उजाड़ा जा रहा है। ग्रामीणों में इस लापरवाही को लेकर भारी आक्रोश है। अगर वक्त रहते उच्च अधिकारियों ने इस पूरे सिंडिकेट पर बुलडोजर नहीं चलाया और दोषी वनकर्मियों को सस्पेंड नहीं किया, तो पेंड्रा का यह हरित क्षेत्र सिर्फ नक्शों में ही सिमट कर रह जाएगा।

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