
तत्कालीन कलेक्टर के आदेश की खुली अवहेलना! शिक्षा विभाग में नियमों को दिखाया ठेंगा?
उपस्थिति प्रमाण-पत्र के बिना वेतन आहरण नहीं करने के थे स्पष्ट निर्देश, फिर किसके संरक्षण में हुआ भुगतान?

गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही।जिले के शिक्षा विभाग में प्रशासनिक आदेशों की कितनी अहमियत है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तत्कालीन कलेक्टर द्वारा जारी स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कथित रूप से नियमों को दरकिनार कर छात्रावास अधीक्षकों का वेतन आहरित कर दिया गया। इससे पूरे मामले पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
24 अप्रैल 2026 को तत्कालीन कलेक्टर द्वारा जारी आदेश क्रमांक 5./327/शि./वेतन आहरण/2026-27 में साफ लिखा गया था कि छात्रावास अधीक्षक का कार्य कर रहे शिक्षकों का वेतन तभी निकाला जाए, जब उनकी मूल संस्था के संस्था प्रमुख से अध्यापन कार्य एवं उपस्थिति का प्रमाण प्राप्त हो जाए। आदेश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि शिक्षक छात्रावास की जिम्मेदारी के साथ-साथ विद्यालय में भी नियमित रूप से अध्यापन करें और विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो।

लेकिन सवाल यह है कि जब आदेश इतना स्पष्ट था, तो फिर बिना उपस्थिति प्रमाण-पत्र के वेतन किसके निर्देश पर निकाला गया? यदि आदेश का पालन नहीं हुआ, तो क्या संबंधित अधिकारियों ने जानबूझकर कलेक्टर के निर्देशों की अनदेखी की? क्या सरकारी आदेश केवल फाइलों तक सीमित रह गए हैं?
यह मामला केवल वेतन आहरण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुशासन और जवाबदेही का भी है। यदि आदेश की अवहेलना हुई है, तो इसकी जिम्मेदारी तय होना आवश्यक है। आखिर किस अधिकारी ने सत्यापन के बिना भुगतान की अनुमति दी? और अब तक उनके विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यह पूरा मामला उच्च स्तरीय जांच की मांग करता है। यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि कलेक्टर के आदेश की अनदेखी कर नियमों के विपरीत भुगतान किया गया, तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई होना स्वाभाविक है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या जिले में तत्कालीन कलेक्टर के आदेशों का पालन होता है, या फिर शिक्षा विभाग में नियमों से ऊपर कुछ और चलता है?















